दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। मध्य प्रदेश के मंडला जिले में ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह सवालों के घेरे में है। शासन करोड़ों रुपये खर्च कर गांव-गांव स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के दावे कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित प्राथमिक एवं उप स्वास्थ्य केंद्र मरीजों के लिए राहत का केंद्र बनने के बजाय केवल सरकारी रिकॉर्ड की शोभा बनकर रह गए हैं। आरोप है कि कई स्वास्थ्य केंद्रों में न तो नियमित उपचार हो रहा है और न ही जिम्मेदार स्वास्थ्य कर्मचारी मुख्यालय में रह रहे हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीणों को मामूली बीमारी के इलाज के लिए भी कई किलोमीटर दूर भटकना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्रों में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता और अन्य कर्मचारी पदस्थ तो हैं, लेकिन अधिकांश समय या तो केंद्र सूने पड़े रहते हैं या फिर कर्मचारी केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है।
सबसे गंभीर आरोप एएनएम और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर लग रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई स्थानों पर वे मुख्यालय में निवास ही नहीं करतीं, जिससे आपात स्थिति में गर्भवती महिलाओं, बच्चों और गंभीर मरीजों को समय पर स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाती। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमराती नजर आ रही है।
वही स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी केवल केंद्र में बैठना नहीं, बल्कि गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करना, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच करना, बच्चों का टीकाकरण सुनिश्चित करना तथा बीमार लोगों को स्वास्थ्य केंद्र तक लाना भी है। लेकिन इन जिम्मेदारियों का पालन होता दिखाई नहीं दे रहा। न जनजागरूकता अभियान चल रहे हैं और न ही घर-घर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित हो रही है।
जानकारी के अनुसार मंडला जिले की नैनपुर तहसील के कई ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। कई केंद्रों में नियमित उपचार नहीं होने से ग्रामीणों में स्वास्थ्य विभाग के प्रति भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ केवल कागजों तक सीमित रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर मरीजों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण नहीं किए जाने के कारण कर्मचारियों की मनमानी बढ़ती जा रही है। यदि समय-समय पर औचक निरीक्षण हो और मुख्यालय में निवास की जांच की जाए तो स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
वही क्षेत्रवासियों ने कलेक्टर एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) से मांग की है कि जिले के सभी ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों का औचक निरीक्षण कराया जाए, मुख्यालय से अनुपस्थित रहने वाले एएनएम एवं स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए तथा प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्र में नियमित उपचार, दवा उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधारी गई तो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर जनता का विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा और इसका खामियाजा सबसे अधिक गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों को भुगतना पड़ेगा। अब देखने वाली बात होगी कि स्वास्थ्य विभाग इन गंभीर शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेता है या फिर ग्रामीणों की पीड़ा एक बार फिर सरकारी फाइलों में ही दबकर रह जाएगी।
