गुरुजी अदृश्य, स्कूल साक्षी! शिक्षा व्यवस्था ने पहन ली ‘गायब’ की चादर

Revanchal
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रेवांचल टाइम्स, मंडला। कहते हैं शिक्षा मंदिर होती है, लेकिन एकीकृत शासकीय माध्यमिक शाला कुसमी में शायद अब मंदिर तो खुलता है, पर पुजारी ही नहीं आते। यहां 5 अतिथि शिक्षक और 1 नियमित शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन बच्चों को पढ़ाने वाला कोई नहीं। लगता है शिक्षा विभाग ने अब “स्वाध्याय मिशन” शुरू कर दिया है—बच्चे खुद पढ़ें, खुद समझें और खुद ही परीक्षा भी पास कर लें।

सरकारी रिकॉर्ड में शिक्षक पूरे हैं, वेतन और मानदेय की व्यवस्था भी पूरी है, लेकिन कक्षा में पहुंचते-पहुंचते शायद शिक्षक अदृश्य हो जाते हैं। बच्चे रोज स्कूल पहुंचते हैं, हाजिरी लगाते हैं, लेकिन ब्लैकबोर्ड उनसे ज्यादा इंतजार करता है। ऐसा लगता है कि अब विद्यालय में सबसे नियमित उपस्थिति ताले, बेंच और खाली कुर्सियों की है।

अगर विद्यालय में छह शिक्षक पदस्थ हैं, तो सवाल यह नहीं कि शिक्षक कितने हैं, बल्कि यह है कि शिक्षण कौन कर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि विभाग ने शिक्षा का नया मॉडल बना लिया हैं “शिक्षक घर से, पढ़ाई भगवान भरोसे।”

शिक्षा विभाग अक्सर दावा करता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उसकी प्राथमिकता है। लेकिन कुसमी की तस्वीर पूछ रही है कि प्राथमिकता शिक्षा है या केवल कागजी उपस्थिति? यदि शिक्षक विद्यालय नहीं पहुंच रहे हैं तो निरीक्षण किस बात का हो रहा है? क्या अधिकारियों की नजर केवल फाइलों तक सीमित है और स्कूल की चौखट तक नहीं पहुंचती?

बच्चों का भविष्य प्रयोगशाला नहीं है कि रोज नए-नए प्रयोग किए जाएं। गांव के अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं, न कि खाली कमरों की गिनती करने।

अगर छह शिक्षक होने के बाद भी बच्चों को शिक्षक न मिलें, तो फिर शिक्षक की कमी नहीं, जवाबदेही की कमी है। अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग इस खबर को भी बच्चों की तरह “स्वाध्याय” पर छोड़ देता है या फिर कुसमी पहुंचकर सचमुच शिक्षा व्यवस्था को कक्षा में वापस लाता है।

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