एक ही व्यक्ति के दोहरे दायित्व पर भी सवाल—ग्राम पंचायत में पंच और तहसील कार्यालय में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम करने का आरोप
दैनिक रेवांचल टाइम्स — घुघरी, मंडला।
आदिवासी बहुल मंडला जिले में यदि एक आदिवासी महिला को अपनी जमीन और मकान की सुरक्षा के लिए जनसुनवाई में पहुंचकर न्याय की गुहार लगाने के साथ आत्महत्या तक की चेतावनी देनी पड़े, तो सवाल सिर्फ एक जमीन विवाद का नहीं रह जाता—सवाल पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर खड़ा होता है।
घुघरी तहसील कार्यालय से जुड़ा एक ऐसा ही मामला मंगलवार की जनसुनवाई में सामने आया। घुघरी ग्राम पंचायत निवासी आदिवासी महिला प्रीति धुर्वे ने प्रशासन के समक्ष आवेदन देकर गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला ने तहसील कार्यालय घुघरी में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत मनोहर नंदा पर उसे और उसके परिवार को कथित रूप से परेशान करने, वर्षों से काबिज भूमि एवं मकान को लेकर दबाव बनाने और मकान गिराने की धमकी देने जैसे आरोप लगाए हैं।



महिला के आवेदन में यह भी कहा गया है कि यदि उसे न्याय नहीं मिला तो वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर होगी और इसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
यह चेतावनी प्रशासन के लिए महज एक आवेदन नहीं, बल्कि व्यवस्था के मुंह पर सवाल है।
आदिवासी महिला पूछ रही—मेरी जमीन और मेरा घर आखिर किसके भरोसे?
प्रीति धुर्वे का दावा है कि उसकी मां मुन्नीबाई लंबे समय से खसरा नंबर 129 की भूमि पर काबिज हैं और इसी भूमि के हिस्से में उनका कच्चा मकान बना हुआ है। परिवार वर्षों से इसी मकान में निवास कर रहा है।
महिला का आरोप है कि अब इसी जमीन और मकान को लेकर उसे तथा उसके परिवार को परेशान किया जा रहा है और कथित रूप से बेदखल करने का प्रयास किया जा रहा है।
गरीब परिवार के लिए वह कच्चा मकान केवल दीवारें नहीं, बल्कि उसका आशियाना है। ऐसे में यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव या धमकी के कारण एक गरीब परिवार अपने घर को लेकर ही असुरक्षित महसूस करने लगे तो फिर शासन की योजनाएं और प्रशासनिक न्याय आखिर किसके लिए हैं?
जेसीबी से मकान गिराने की कथित धमकी—किसके दम पर?
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि मनोहर नंदा द्वारा उसे कथित रूप से धमकाया जाता है और यह कहा जाता है कि वह जहां चाहे शिकायत कर ले, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
महिला ने यह भी आरोप लगाया है कि संबंधित व्यक्ति तहसील कार्यालय में अपनी पहुंच का हवाला देते हुए कथित तौर पर यह प्रभाव जताता है कि तहसीलदार से जैसा कहेगा, वैसा ही काम कराया जाएगा।
इतना ही नहीं, महिला ने कच्चे मकान को जेसीबी से गिरवा देने की धमकी का भी आरोप लगाया है।
यदि ये आरोप गलत हैं तो जांच में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए, लेकिन यदि आरोप सही हैं तो सवाल यह है कि एक प्राइवेट कर्मचारी को आखिर ऐसी धमकी देने का साहस और प्रशासनिक पहुंच का भरोसा कहां से मिला?
स्वामित्व योजना में भी कथित अड़ंगा—सरकारी योजना किसके लिए?
शिकायत में सबसे गंभीर आरोप आबादी भूमि और स्वामित्व योजना से जुड़ा है।
प्रीति धुर्वे का कहना है कि जिस जमीन पर उनका परिवार वर्षों से काबिज है, वहां स्वामित्व योजना के तहत अधिकार और पट्टा मिलने की प्रक्रिया चल रही थी। महिला का आरोप है कि इस प्रक्रिया में भी कथित रूप से बाधा डाली गई और उनका पट्टा नहीं बनने दिया गया।
महिला ने यह भी आरोप लगाया है कि उसी भूमि से संबंधित भू-आवासीय अधिकार पत्र मनोहर नंदा के नाम से बनाए जाने की जानकारी उसे मिली।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला निजी विवाद से कहीं आगे बढ़ जाएगा। फिर सवाल उठेगा कि सरकारी रिकॉर्ड, स्वामित्व योजना और राजस्व प्रक्रिया तक किसकी पहुंच है और कौन प्रभावित कर रहा है?
पंच भी, तहसील का प्राइवेट ऑपरेटर भी—हितों के टकराव पर प्रशासन खामोश क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल संबंधित व्यक्ति की भूमिका को लेकर है।
शिकायत के अनुसार मनोहर नंदा ग्राम पंचायत के वार्ड क्रमांक 8 से निर्वाचित पंच हैं और साथ ही तहसील कार्यालय घुघरी में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्य कर रहे हैं।
एक तरफ निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधि और दूसरी तरफ तहसील कार्यालय में राजस्व संबंधी कार्यालयीन कार्यों से जुड़ी भूमिका—ऐसे में आम नागरिकों के भूमि, पट्टा और राजस्व संबंधी मामलों में हितों के टकराव की संभावना को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है?
प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि—
प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर की नियुक्ति किस आधार पर हुई?
उसका वास्तविक कार्यक्षेत्र क्या है?
क्या उसे राजस्व रिकॉर्ड अथवा पट्टा संबंधी प्रक्रिया तक पहुंच प्राप्त है?
एक निर्वाचित पंच के रूप में उसकी भूमिका और तहसील कार्यालय की भूमिका के बीच कोई हितों का टकराव तो नहीं?
इन सवालों का जवाब घुघरी तहसील प्रशासन और जिला प्रशासन को देना चाहिए।
कई आवेदन, फिर भी कार्रवाई कहां?
प्रीति धुर्वे का दावा है कि वह पहले भी कई बार शिकायत कर चुकी है, लेकिन उसकी समस्या का समाधान नहीं हुआ।
यदि कोई गरीब आदिवासी महिला बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद भी न्याय से वंचित महसूस करे और आखिरकार जनसुनवाई में पहुंचकर आत्महत्या की चेतावनी देने लगे, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल है।
क्या शिकायतें केवल आवेदन लेने तक सीमित हैं?
क्या जांच सिर्फ कागजों में होती है?
क्या कमजोर की आवाज तब तक नहीं सुनी जाएगी, जब तक वह कोई बड़ा कदम उठाने की स्थिति में न पहुंच जाए?
आदिवासी जिले में आदिवासी की सुनवाई कौन करेगा?
मंडला को आदिवासी बहुल जिला कहा जाता है। सरकार आदिवासी हितों, उनके अधिकारों और उनके संरक्षण के लिए तमाम योजनाओं और कानूनों की बात करती है।
लेकिन जमीनी तस्वीर तब सवाल खड़े करती है जब एक आदिवासी महिला अपनी जमीन और मकान की सुरक्षा के लिए जनसुनवाई में खड़ी होकर कहती है कि न्याय नहीं मिला तो वह अपनी जान दे देगी।
यह सिर्फ प्रीति धुर्वे का मामला नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जो आम आदिवासी नागरिक सरकारी व्यवस्था पर करता है।
यदि तहसील के दरवाजे पर ही गरीब और कमजोर व्यक्ति खुद को असहाय महसूस करने लगे, तो फिर शासन की योजनाओं और प्रशासनिक न्याय का मतलब क्या रह जाता है?
जिम्मेदारों की चुप्पी भी अब सवालों के घेरे में
अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन से है। जनसुनवाई में आवेदन पहुंच चुका है। आरोप गंभीर हैं। जमीन का खसरा नंबर सामने है। स्वामित्व योजना का मुद्दा सामने है। तहसील कार्यालय में संबंधित व्यक्ति की भूमिका पर सवाल है और सबसे चिंताजनक बात—शिकायतकर्ता ने आत्महत्या की चेतावनी दी है।
ऐसे में मामले को फाइलों में दबाने के बजाय समयबद्ध और निष्पक्ष जांच की जरूरत है।
खसरा नंबर 129 की मौके पर जांच हो।
कब्जे की वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए।
स्वामित्व योजना से जुड़े रिकॉर्ड की जांच हो।
भू-आवासीय अधिकार पत्र की सत्यता जांची जाए।
तहसील कार्यालय में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर की नियुक्ति और अधिकारों की जांच हो।
शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष का बयान दर्ज किया जाए।
और यदि धमकी या दबाव के आरोप प्रमाणित होते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई हो।
अब देखना यह है—प्रशासन जागेगा या एक और शिकायत फाइलों में दफन होगी?
यह मामला अब घुघरी तहसील की चौखट से निकलकर जिला प्रशासन की जवाबदेही का सवाल बन चुका है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक मकान का नहीं है। सवाल यह है कि क्या एक गरीब आदिवासी परिवार को अपने ही घर में रहने का अधिकार सुरक्षित है? सवाल यह है कि क्या तहसील कार्यालय में बैठे प्राइवेट कर्मचारियों की भूमिका की कोई सीमा है? और सवाल यह भी है कि अगर किसी महिला को न्याय मांगते-मांगते आत्महत्या की चेतावनी देनी पड़े, तो आखिर जिम्मेदार कौन है?
महिला के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच में देरी खुद प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—क्या घुघरी की इस आदिवासी महिला की आवाज सुनी जाएगी, या फिर मंडला के आदिवासी जिले में आदिवासी की फरियाद एक बार फिर सरकारी फाइलों के नीचे दबकर रह जाएगी?
