
5 हजार कर्मचारियों की सेवाएं खत्म, अब भोपाल में अनिश्चितकालीन आंदोलन; सरकार से सीधा सवाल—जिन्होंने गांव-गांव योजनाएं पहुंचाईं, उन्हीं के घर का चूल्हा क्यों बुझाया?
दैनिक रेवांचल टाईम्स | भोपाल | 24 अगस्त 2026
मध्यप्रदेश में पंचायत पेसा मोबिलाइज़र कर्मचारियों की सेवा समाप्ति का मामला अब सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बनता दिखाई दे रहा है। अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों में वर्षों तक गांव-गांव घूमकर शासन की योजनाओं, पेसा कानून और ग्रामसभा की व्यवस्थाओं को जमीन पर उतारने वाले लगभग 5 हजार पंचायत पेसा मोबिलाइज़र कर्मचारी अब अपने अधिकार और रोजगार की लड़ाई लेकर राजधानी भोपाल में डट गए हैं।
पंचायत पेसा मोबिलाइज़र कर्मचारी संघ मध्यप्रदेश ने 24 अगस्त 2026 से भोपाल के अंबेडकर पार्क, तुलसी नगर में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया है। आंदोलन प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चलेगा।
सरकार की योजनाओं को गांव तक पहुंचाने वाले आज खुद सरकार के दरवाजे पर
संघ के अनुसार अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के 20 जिलों और 89 विकासखंडों में कार्यरत लगभग 5 हजार कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। संगठन का दावा है कि इनमें करीब 80 प्रतिशत लाड़ली बहनें और 20 प्रतिशत लाड़ले भैया शामिल हैं।
यही कर्मचारी कभी सरकार की योजनाओं का प्रचार करने के लिए गांव-गांव पहुंचते थे। आज वही कर्मचारी अपने रोजगार और परिवार के भविष्य के लिए सरकार के सामने खड़े हैं।
सवाल सीधा है—जब इन कर्मचारियों से सरकार की योजनाओं को घर-घर पहुंचाने का काम लिया गया, तब उनकी जरूरत थी; अब काम पूरा होने के बाद उनके भविष्य की जिम्मेदारी किसकी है?
पेसा लागू कराने में भूमिका का दावा
संगठन के मुताबिक वर्ष 2022 में पेसा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के उद्देश्य से पंचायत पेसा मोबिलाइज़र की नियुक्तियां की गई थीं। कर्मचारियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में पेसा कानून का प्रचार-प्रसार करने के साथ ग्रामसभाओं को मजबूत करने, समितियों के गठन और ग्रामीणों को शासन की योजनाओं से जोड़ने का काम किया।
संघ का दावा है कि पेसा अधिनियम के तहत विभिन्न समितियों के गठन, ग्रामीणों के बैंक खाते खुलवाने, पेसा कोष नीति लागू कराने और ग्रामसभाओं को सक्रिय बनाने में मोबिलाइज़र की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
गांव के विवाद गांव में सुलझाने का दावा
संघ का कहना है कि शांति एवं विवाद निवारण समितियों के माध्यम से हजारों छोटे-बड़े विवादों का गांव स्तर पर समाधान कराया गया। इससे ग्रामीणों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए थाने और न्यायालयों के चक्कर लगाने से राहत मिली।
इसके अलावा आयुष्मान भारत, पेंशन योजनाओं, ग्रामसभा गठन और अन्य शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में भी इन कर्मचारियों ने सक्रिय भूमिका निभाने का दावा किया है।
लाड़ली बहना योजना में घर-घर पहुंचकर कराया पंजीयन
सरकार की महत्वाकांक्षी लाड़ली बहना योजना के क्रियान्वयन में भी पंचायत पेसा मोबिलाइज़र की भूमिका का दावा किया गया है। संगठन के अनुसार कर्मचारियों ने घर-घर जाकर पात्र महिलाओं की जानकारी जुटाने और पंजीयन कराने में सहयोग किया, जिससे बड़ी संख्या में महिलाओं को योजना से जोड़ने में मदद मिली।
अब वही लाड़ली बहनें सरकार से पूछ रही हैं कि जिस व्यवस्था को मजबूत करने में उन्होंने अपना समय और मेहनत लगाई, उसी व्यवस्था में उनके लिए रोजगार की जगह क्यों नहीं बची?
5 हजार परिवारों पर रोजी-रोटी का संकट
संघ के मुताबिक लगभग 5 हजार कर्मचारी शिक्षित, डिग्रीधारी और कंप्यूटर प्रशिक्षित हैं। सेवा समाप्त होने के बाद इन कर्मचारियों के सामने बेरोजगारी और परिवार के भविष्य का संकट खड़ा हो गया है।
कर्मचारियों का दावा है कि कई ग्राम पंचायतों और ग्रामसभा अध्यक्षों ने उनकी सेवा बहाली के समर्थन में प्रस्ताव तक पारित किए हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।
ग्रामसभा प्रभावित हुई तो पेसा का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
पंचायत पेसा मोबिलाइज़र कर्मचारियों का कहना है कि उनकी अनुपस्थिति का सीधा असर ग्रामसभा की गतिविधियों और शासन की योजनाओं की जानकारी ग्रामीणों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर पड़ रहा है।
यदि सरकार पेसा क्षेत्रों में ग्रामसभा को मजबूत करना चाहती है तो सवाल यह भी है कि ग्रामसभा और पेसा व्यवस्था को जमीन पर सक्रिय रखने वाले हजारों प्रशिक्षित कर्मचारियों की भूमिका को अचानक समाप्त करने का आधार क्या है?
24 अगस्त से राजधानी में अनिश्चितकालीन डेरा
पंचायत पेसा मोबिलाइज़र कर्मचारी संघ ने सरकार को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब लड़ाई सिर्फ सेवा बहाली की नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य की है।
संघ ने मांग की है कि कर्मचारियों की सेवा बहाली पर सरकार तत्काल सकारात्मक निर्णय ले। संगठन ने चेतावनी दी है कि मांगों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
अब नजर सरकार पर है—क्या सरकार उन 5 हजार कर्मचारियों की आवाज सुनेगी, जिन्होंने वर्षों तक गांवों में शासन की योजनाओं की आवाज पहुंचाई, या फिर लाड़ली बहनों और लाड़ले भैयाओं को अपनी ही सरकार के दरवाजे पर रोजगार के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी?
