जब पूरा मध्य प्रदेश दिवाली की रौनक में डूबा था और नर्मदा नदी के किनारे गौरीघाट पर 51,000 दिए जलाए जा रहे थे…
जब पूरा मध्य प्रदेश दिवाली की रौनक में डूबा था और नर्मदा नदी के किनारे गौरीघाट पर 51,000 दिए जलाए जा रहे थे, उसी समय जबलपुर से 45 किलोमीटर दूर सिहोरा में कुछ लोगों ने अपने खून से दिए जलाए। दरअसल, अपने खून से दिए जलाकर वे सरकार से सवाल कर रहे थे कि सिहोरा कब ज़िला बनेगा। यह आंदोलन लक्ष्य ज़िला सिहोरा आंदोलन समिति के आह्वान पर आयोजित किया गया था। सैकड़ों लोगों ने अपने शरीर से खून निकाला, उससे दिए भरे और उन्हें जलाया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह सिर्फ़ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सिहोरा के प्रति वर्षों की उपेक्षा और उदासीनता के ख़िलाफ़ दर्द और आत्म-बलिदान का प्रतीक है।
सिहोरा को ज़िला बनाने की माँग दशकों पुरानी है। 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई थी, लेकिन चुनाव आचार संहिता और उसके बाद सत्ता परिवर्तन के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया। आंदोलन समिति ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने तुरंत कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन तेज़ होगा। समिति के संयोजक अनिल जैन ने बताया कि भूमि समाधि सत्याग्रह का अगला चरण 26 अक्टूबर से शुरू होगा। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से कहा कि उनके जलते हुए रक्त के दीये सिर्फ़ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा और सिहोरा की पीड़ा का प्रतीक हैं। प्रदर्शन के दौरान मोहन सरकार के ख़िलाफ़ “अपना वादा निभाओ” के नारे लगाए गए।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने विधानसभा चुनाव के दौरान सिहोरा को ज़िला बनाने का वादा किया था, लेकिन यह सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ है। दिवाली की रात जलते इन दीपों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि सिहोरा को जिला बनने का सपना कब साकार होगा।
