साढ़े चार लाख का हवा में तैरता खेत तालाब कागजों पर विकास जमीन पर गायब

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाइम्स चाबी मंडला
जिले में भ्रष्टाचार और योजनाओं में गड़बड़ी के आरोप कोई नई बात नहीं रह गए हैं, लेकिन इस बार जो मामला सामने आया है उसने ग्रामीण विकास योजनाओं की पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला जनपद पंचायत मोहगांव अंतर्गत ग्राम पंचायत चाबी का है, जहां शासन की महत्वाकांक्षी योजना खेत तालाब योजना” का तालाब जमीन पर नहीं बल्कि कथित तौर पर “हवा में” बना दिया गया। जो दिखाई ही नही दे रहा है सरकारी दस्तावेजों में तालाब तैयार हो गया, लाखों रुपये की राशि भी निकाल ली गई, मजदूरी का भुगतान भी हो गया, लेकिन मौके पर तालाब का नामोनिशान तक नहीं मिला।


सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार ग्राम पंचायत चाबी में सरपंच के भाई सेवकराम धुर्वे पिता देवी सिंह धुर्वे को खेत तालाब योजना का लाभ दिया गया। खेत तालाब निर्माण के लिए खसरा नंबर 85/2, रकबा 0.29 हेक्टेयर भूमि का चयन किया गया था। दस्तावेजों में इसी जमीन पर तालाब निर्माण दर्शाया गया और लगभग चार से साढ़े चार लाख रुपये तक की राशि स्वीकृत कर निकाली गई। लेकिन जब मौके पर देखा गया । तो वहां किसी प्रकार का तालाब मौजूद नहीं मिला।


सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चयनित भूमि पर तालाब बना ही नहीं, तो फिर सरकारी राशि आखिर गई कहां ।निर्माण कार्य किस जगह कराया गया ।मजदूरी भुगतान किन लोगों के खातों में डाला गया क्या केवल कागजों में मस्टर रोल भरकर भुगतान निकाल लिया गया।

यह पूरा मामला अब जांच की मांग कर रहा है।ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत में योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक कम और प्रभावशाली लोगों तक ज्यादा पहुंचता है। आरोप यह भी है कि पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से योजनाओं को कागजों में पूरा दिखाकर राशि का बंदरबांट किया जाता है। इस मामले में भी हितग्राही सरपंच का भाई बताया जा रहा है, जिससे पूरे प्रकरण पर संदेह और गहरा गया है।


जब इस संबंध में ग्राम पंचायत चाबी के सरपंच गया प्रसाद मरावी से बात की गई तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि “यहां पर सब कुछ संभव है। यह कोई नई बात नहीं है। जमीन कहीं और की होती है और निर्माण कहीं और दिखा दिया जाता है। यहां यह सब चलता रहता है।” सरपंच का यह बयान खुद इस बात की ओर इशारा करता है कि पंचायत स्तर पर योजनाओं में गड़बड़ी कोई अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।सरपंच के इस बयान ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या पंचायत में पहले भी इसी तरह फर्जी निर्माण दिखाकर राशि निकाली जाती रही है। क्या मनरेगा और अन्य योजनाओं में वर्षों से यही खेल चल रहा है। क्या जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद किए बैठे हैं दरअसल शासन द्वारा खेत तालाब योजना किसानों की सिंचाई सुविधा बढ़ाने और जल संरक्षण के उद्देश्य से चलाई जाती है। इसका मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में पानी का संचय कर खेती को मजबूत बनाना है।

लेकिन मंडला जिले में यह योजना भ्रष्टाचार का जरिया बनती दिखाई दे रही है। यहां तालाब बनने से पहले ही पैसा बह गया और पानी बचाने की योजना खुद भ्रष्टाचार में डूब गई।
गांव के लोगों का कहना है कि अगर किसी सामान्य गरीब व्यक्ति के दस्तावेजों में छोटी सी त्रुटि मिल जाए तो उसे योजना का लाभ नहीं मिलता, लेकिन यहां बिना तालाब बने ही लाखों रुपये का भुगतान हो गया। इससे साफ जाहिर होता है कि पंचायत से लेकर अधिकारियों तक मिलीभगत के बिना ऐसा संभव नहीं है।इस पूरे मामले में पंचायत सचिव, रोजगार सहायक, उपयंत्री और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। निर्माण कार्य का सत्यापन किसने किया।

माप पुस्तिका किस आधार पर भरी गई। भुगतान की अनुमति किस अधिकारी ने दी। यदि तालाब नहीं बना तो फिर तकनीकी स्वीकृति और पूर्णता प्रमाणपत्र कैसे जारी कर दिए गए।
जब इस विषय में एपीओ मनरेगा अधिकारी से चर्चा की गई तो उन्होंने भी रटा-रटाया जवाब देते हुए कहा कि “मुझे जानकारी मिली है, सचिव को दस्तावेज लेकर बुलाया गया है, लेकिन सचिव अभी तक नहीं आया।”

अधिकारी का यह जवाब प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदारी से बचने का प्रयास माना जा रहा है। यदि अधिकारी वास्तव में सचेत होते तो मौके पर तत्काल जांच कर कार्रवाई करते, लेकिन यहां मामला केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित दिखाई दे रहा है।


यह मामला सिर्फ एक खेत तालाब का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का है जो ग्रामीण जनता सरकार की योजनाओं पर करती है। सरकार गांवों के विकास और किसानों की मदद के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन यदि जमीनी स्तर पर यही हाल रहा तो योजनाएं केवल फाइलों और कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी।


विडंबना यह है कि सरकार “जल बचाओ, भविष्य बचाओ” का संदेश दे रही है, जबकि मंडला में तालाब ही गायब हो रहे हैं। ग्रामीणों में अब यह चर्चा व्यंग्य का विषय बन चुकी है कि “मंडला में पानी बचाने की नई तकनीक आ गई है—तालाब जमीन पर नहीं, हवा में बनाए जा रहे हैं।”


अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या केवल जांच के नाम पर खानापूर्ति होगी या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होगी क्या जनता के पैसों की वसूली होगी क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज होगी।या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।


फिलहाल चाबी पंचायत का यह “हवा में तैरता खेत तालाब” मंडला जिले में विकास कार्यों की हकीकत और भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर कर रहा है। जनता अब जवाब चाहती है—आखिर साढ़े चार लाख रुपये का तालाब गया कहां।

क्या कहते है जिम्मेदार..

संबंधित भ्रष्टाचार को लेकर जब मोहगांव जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से जानकारी लेना चाहा गया तो मुख्य कार्यपालन अधिकारी के द्वारा फोन रिसीव नही किया गया जिससे प्रतीत होता हे कि संबंधित अधिकारी अपने कर्तव्यों को लेकर कितने सजग हैं।
इसके पूर्व में भी संबंधित जिम्मेदार अधिकारी से अन्य मामलों को लेकर जानकारी लेनी चाही गई लेकिन जिम्मेदार अधिकारी द्वारा कॉल रिसीव नही किया जाता।

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