दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, समाज में दान की चर्चा प्रायः तब होती है जब कोई धनवान व्यक्ति बड़ी राशि अर्पित करता है। बड़े-बड़े दानपत्र, सम्मान समारोह और समाचारों की सुर्खियाँ उसी के हिस्से में आती हैं। किन्तु कभी-कभी ईश्वर संसार को यह दिखाने के लिए एक छोटी-सी घटना घटित कर देते हैं कि दान की महिमा धन की मात्रा में नहीं, भाव की गहराई में होती है।
पुरुषोत्तमी एकादशी के पावन अवसर पर मां नर्मदा के तट पर बैठकर भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करने वाली एक वृद्ध माताजी ने महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी के रथ हेतु ₹501/- की राशि संध्या आरती मंच, श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार को समर्पित की।
पहली दृष्टि में यह राशि किसी को साधारण लग सकती है, किन्तु यदि हम उस वृद्धा की परिस्थिति को समझें तो यह ₹501 नहीं, बल्कि उनकी श्रद्धा, आस्था, त्याग और समर्पण का अमूल्य खजाना है। जिस व्यक्ति के पास संसाधनों का अभाव हो, जिसके जीवन का आधार ही दूसरों की करुणा हो, उसके द्वारा किया गया दान वास्तव में आत्मा की संपत्ति का दान होता है।
यह घटना हम सभी से एक प्रश्न पूछती है— क्या दान केवल सम्पन्न लोगों का अधिकार है? नहीं।
दान धन का नहीं, मन का विषय है। जिसके हृदय में श्रद्धा है, वह अपनी क्षमता के अनुसार अवश्य देता है। कोई लाखों देता है, कोई सैकड़ों देता है, और कोई अपनी श्रम-सेवा देता है; किन्तु ईश्वर के तराजू में मूल्य राशि का नहीं, भावना का होता है।
आज जब अनेक लोग यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि “हमारे छोटे से सहयोग से क्या होगा?”, तब यह वृद्ध माताजी अपने आचरण से उत्तर देती हैं कि छोटा दान नहीं होता, छोटी केवल हमारी सोच होती है।
भिक्षा मांगकर जीवन चलाने वाली यह माताजी वास्तव में समाज को यह सिखा रही हैं कि सेवा और सहयोग के लिए धनवान होना आवश्यक नहीं, बल्कि संवेदनशील होना आवश्यक है। उनका यह समर्पण उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो सामर्थ्य होते हुए भी किसी पुण्य कार्य में सहयोग करने से कतराते हैं।
महाप्रभु जगन्नाथ और मां नर्मदा की कृपा से हमें भी ऐसा ही भाव प्राप्त हो कि हम अपने सामर्थ्य के अनुसार धर्म, संस्कृति, सेवा और समाजहित के कार्यों में योगदान दें।
आइए, इस वृद्ध माताजी के त्याग और श्रद्धा को नमन करें और संकल्प लें कि हम भी किसी न किसी रूप में पुण्य कार्यों के सहभागी बनेंगे।
यही सच्ची सेवा है।
यही सच्ची भक्ति है।
