पंचायत और ठेकेदार की लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे मासूम बच्चे और ग्रामीण
दैनिक रेवांचल टाइम्स | घुघरी (मंडला)।
एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया, विकसित भारत और आदिवासी विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, तो दूसरी ओर मंडला जिले के दूरस्थ आदिवासी अंचलों की तस्वीर इन दावों की सच्चाई उजागर कर रही है। जनपद पंचायत घुघरी अंतर्गत ग्राम पंचायत लाटो के नंदा मोहल्ला में निर्माणाधीन पुल आज विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि भ्रष्ट कार्यप्रणाली, विभागीय लापरवाही और ठेकेदारों की मनमानी का जीता-जागता स्मारक बन चुका है।
जिस पुल से ग्रामीणों को सुरक्षित आवागमन मिलना था, वही आज रोजाना मौत का रास्ता बन गया है। मासूम स्कूली बच्चे लकड़ियों के सहारे नाला पार कर अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। महिलाएं, बुजुर्ग और किसान हर दिन इस डर के साथ पुल पार करते हैं कि पता नहीं अगला कदम सुरक्षित होगा या नहीं। लेकिन जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों और निर्माण एजेंसी की संवेदनाएं मानो पूरी तरह मर चुकी हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी खजाने से स्वीकृत राशि किस बात की निकाली गई? यदि निर्माण समय पर पूरा नहीं होना था तो जनता की जान खतरे में डालकर अधूरा पुल क्यों छोड़ दिया गया? क्या निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों को शासन-प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है, इसलिए कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है?
विडंबना यह है कि मंडला आदिवासी बाहुल्य जिला है। सरपंच से लेकर विधायक, सांसद और मंत्री तक आदिवासी समाज से हैं, लेकिन आज भी आदिवासी गांव सड़क, पुल, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर विकास के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये किसकी जेब भर रहे हैं? यदि गांवों तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचीं, तो विकास के दावे आखिर किसके लिए हैं?
वही ग्राम पंचायतों में इस कदर सरकारी धन की लूट मची है कि जिम्मेदार ग्राम पंचायत और जनपद पंचायत विभाग के अधिकारी मौके पर झांकने तक नहीं पहुंचे। इससे साफ प्रतीत होता है कि प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद औपचारिक जांच और मुआवजे की राजनीति करने का इंतजार कर रहा है। यदि कल कोई मासूम बच्चा, गर्भवती महिला या बुजुर्ग इस अधूरे पुल की वजह से हादसे का शिकार होता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित विभाग, निर्माण एजेंसी और ठेकेदार की होगी।
यह केवल एक अधूरे पुल का मामला नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जहां सरकारी निर्माण कार्य गुणवत्ता और समयसीमा को ताक पर रखकर किए जाते हैं, भुगतान हो जाता है, लेकिन जनता को अधूरा काम और जानलेवा सुविधाएं मिलती हैं। निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय न होने से ठेकेदार बेखौफ हैं और अधिकारी मौन रहकर उनकी ढाल बने हुए दिखाई देते हैं।
अब समय आ गया है कि केवल कागजी विकास नहीं, बल्कि जमीनी जवाबदेही तय हो। जिला प्रशासन को तत्काल निर्माण कार्य पूरा कराने के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों, निर्माण एजेंसी और ठेकेदार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। क्योंकि यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो यह मान लिया जाएगा कि आदिवासी अंचलों की जिंदगी सत्ता और सिस्टम के लिए केवल आंकड़े भर हैं, जिनकी सुरक्षा और सम्मान की कोई कीमत नहीं।
पंचायत निर्माण एजेंसी, लेकिन हावी ठेकेदारी प्रथा! आखिर जवाबदेह कौन?
वही पूरे जनपद पंचायत घुघरी की ग्राम पंचायतों में ठेकेदारी प्रथा हावी होते दिखाई पड़ रही है जहाँ शासन की नियंम अनुसार ग्राम पंचायत स्वयं ही निर्माण एजेंसी वावजूद इसके ठेकेदार और पंचायत गठबंधन कर निर्माण कार्यो को ठेके में देकर कार्यो को मटियामेट और घटिया कार्य किया जा रहा है और जनपद पंचायत में बैठे मुख्य कार्यपालन अधिकारी अनुविभागीय अधिकारी और उपयंत्री कभी निर्माण स्थल में नजर ही नही आते है सब ऑफ़िस में बेठे बैठे ही कार्यो की गुणवत्ता से लेकर मूल्याकन तक किये जा रहे हैं, जहा ग्राम पंचायत को निर्माण एजेंसी बनाकर स्थानीय विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का उद्देश्य रखा गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायतों में कथित ठेकेदारी प्रथा पूरी तरह हावी है, जिसके कारण निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं होते और गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में रहती है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम ग्रामीणों, महिलाओं और मासूम स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।
नंदा मोहल्ला का अधूरा पुल इसी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब पंचायत ही निर्माण एजेंसी है, तो आखिर निर्माण कार्य अधूरा छोड़ने की जिम्मेदारी किसकी है? पंचायत प्रतिनिधियों की, संबंधित अधिकारियों की या निर्माण कार्य कराने वाले लोगों की?
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतों के बावजूद जनप्रतिनिधि मौन हैं और प्रशासन भी आंखें मूंदे बैठा है। सवाल उठता है कि क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी? यदि कल किसी मासूम बच्चे, बुजुर्ग या महिला के साथ अनहोनी होती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय कौन करेगा?
विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन यदि आदिवासी अंचलों के ग्रामीण आज भी अधूरे पुल, बदहाल सड़कों और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जान जोखिम में डालकर जीवन जीने को मजबूर हैं, तो यह केवल निर्माण कार्य की विफलता नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने में पूरी व्यवस्था की नाकामी है।
तस्वीर जो विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है…
“कंधों पर बस्ता, आंखों में पढ़ने का सपना, लेकिन स्कूल पहुंचने के लिए मौत के रास्ते से गुजरने की मजबूरी। ग्राम पंचायत लाटो के नंदा मोहल्ला में निर्माणाधीन अधूरे पुल पर पटिया रखकर ग्रामीण मासूम स्कूली बच्चों को सहारा देकर पार करा रहे हैं। यह दृश्य केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि उन विकास के दावों पर बड़ा सवाल है जिनमें आदिवासी अंचलों तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने की बात कही जाती है।”
फोटो कैप्शन:
“मंडला के घुघरी जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत लाटो के नंदा मोहल्ला में अधूरे पुल पर पटिया रखकर ग्रामीण स्कूली बच्चों को सुरक्षित पार कराते हुए। सवाल यह है कि यदि इसी दौरान कोई हादसा हो जाए, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?”
