दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/बिलासपुर। महाकौशल और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों को नई विकास गति देने वाली प्रस्तावित बिलासपुर-मंडला-जबलपुर नई रेल लाइन परियोजना को पुनः शुरू कराने की मांग तेज हो गई है। स्वतंत्र रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी द्वारा तैयार विस्तृत मांग पत्र केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तथा बिलासपुर सांसद तोखन साहू को उनके प्रतिनिधि के माध्यम से सौंपा गया।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि रेलवे बोर्ड ने इस परियोजना के संबंध में अपने ही नियमों का पालन नहीं किया। वर्ष 2004 में जारी आदेश के अनुसार योजना की हर 10 वर्ष में समीक्षा (रिव्यू सर्वे) होना था, लेकिन 2014 के बाद अब तक कोई पुनरीक्षण नहीं कराया गया। इस कारण क्षेत्र की महत्वपूर्ण रेल परियोजना वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है।
पत्र में बताया गया है कि ब्रिटिश काल से लंबित यह परियोजना वर्ष 1944 से चर्चा में है। वर्ष 1997 में इसका इंजीनियरिंग एवं ट्रैफिक सर्वे स्वीकृत हुआ था, लेकिन 2003-04 में कम प्रतिफल दर (ROR) का हवाला देकर इसे रोक दिया गया। वर्तमान में जबलपुर से बिलासपुर के बीच यात्रा के लिए 407 से 517 किलोमीटर लंबे मार्गों का उपयोग करना पड़ता है, जबकि प्रस्तावित रेल लाइन की लंबाई लगभग 372 किलोमीटर होगी। आधुनिक संरेखण के अनुसार यह दूरी और भी कम होकर करीब 340 किलोमीटर रह सकती है।
नितिन सोलंकी का कहना है कि वर्तमान औद्योगिक विकास, पर्यटन गतिविधियों और बढ़ती माल ढुलाई को देखते हुए नए सर्वे में परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता पहले की तुलना में काफी बेहतर साबित हो सकती है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि छत्तीसगढ़ में कटघोरा-पंडरिया-डोंगरगढ़ रेल परियोजना के आगे बढ़ने से यह मार्ग अब एक महत्वपूर्ण “मिसिंग लिंक” बन गया है।
ज्ञापन में केंद्रीय मंत्री तोखन साहू से आगामी संसद सत्र में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने, रेल मंत्रालय से पुनरीक्षण सर्वे कराने तथा परियोजना को राष्ट्रीय प्राथमिकता कॉरिडोर घोषित कराने की मांग की गई है। क्षेत्रवासियों का मानना है कि यह रेल लाइन महाकौशल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
