कान्हा में भी कई जमीनों के मालिक है डिप्टी कमिश्नर सरवटे ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के बाद नया खुलासा – कान्हा क्षेत्र में भी करोड़ों की जमीनों का मालिक निकला डिप्टी कमिश्नर सरवटे!

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कान्हा में भी कई जमीनों के मालिक है डिप्टी कमिश्नर सरवटे ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के बाद नया खुलासा – कान्हा क्षेत्र में भी करोड़ों की जमीनों का मालिक निकला डिप्टी कमिश्नर सरवटे!

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला/जबलपुर

आदिम जाति कल्याण विभाग में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर जगदीश प्रसाद सरवटे के खिलाफ आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) की कार्रवाई के बाद अब एक और बड़ा खुलासा सामने आया है। जांच में सामने आए दस्तावेज़ों के मुताबिक सरवटे न सिर्फ भोपाल और जबलपुर में संपत्ति के मालिक हैं, बल्कि मंडला जिले के कान्हा क्षेत्र में भी उन्होंने कई हेक्टेयर जमीनें अपने नाम पर दर्ज कराई हैं — जिनकी कीमत करोड़ों में आंकी जा रही है।

कान्हा की गोद में ‘खरीदी गई’ बेशकीमती जमीनें

जारी आधिकारिक दस्तावेज़ों के मुताबिक, ग्राम – मोचा, तहसील – बिछिया, जिला – मंडला में डिप्टी कमिश्नर सरवटे के नाम दो प्रमुख खसरा नंबर (447 और 448) पर जमीनें दर्ज हैं। ये दोनों खसरे सरकारी अभिलेखों में निजी स्वामित्व और व्यावसायिक एवं कृषि प्रयोजन के रूप में दर्ज हैं:

खसरा नंबर 448 (S):
क्षेत्रफल: 0.3200 हेक्टेयर (3200 वर्ग मीटर)

उपयोग: व्यावसायिक
कीमत: ₹3200.00 (नाममात्र राजस्व दर)

स्थान: मोंचा, बिछिया, मंडला
स्वामित्व: जगदीशप्रसाद पिता नेमलाल, जाति गोंड

खसरा नंबर 447 (S):
क्षेत्रफल: 0.4300 हेक्टेयर (4300 वर्ग मीटर)
उपयोग: कृषि निम आरक्षित
कीमत: ₹1984.00 (नाममात्र दर)
स्थान: मोंचा, बिछिया, मंडला
स्वामित्व: जगदीशप्रसाद पिता नेमलाल

यह ज़मीनें कथित रूप से 04 अक्टूबर 2022 को दस्तावेज क्रमांक MP238362022A11007649 और 7699 के माध्यम से स्थानांतरित की गई थीं, जिसकी विधिवत पुष्टि 06 दिसंबर 2022 को तहसील न्यायालय द्वारा हुई।

व्यावसायिक उपयोग की ज़मीन, लेकिन राजस्व दर नाममात्र!

खास बात यह है कि खसरा नंबर 448 की भूमि को ‘व्यावसायिक’ उपयोग हेतु दर्शाया गया है, लेकिन इसके लिए केवल ₹3200 का भू-राजस्व दर्शाया गया है। ये दरें संदिग्ध हैं क्योंकि ऐसे पर्यटन क्षेत्र (कान्हा टाइगर रिज़र्व से सटा इलाका) में ज़मीन की वास्तविक बाज़ार कीमत करोड़ों में होती है।

न्यायालयीय आदेश की आड़ में हस्तांतरण?

दोनों ज़मीनों के ट्रांसफर का आधार तहसील न्यायालय द्वारा पारित आदेश बताए गए हैं, लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं:
क्या ये आदेश केवल खानापूर्ति के लिए लिए गए थे?
क्या विभाग को इन ट्रांसफरों की जानकारी थी?
क्या इस पूरे हस्तांतरण में ‘आय से अधिक संपत्ति’ की योजना पहले से तैयार थी?

क्यों ज़रूरी है विस्तृत जांच?

ईओडब्ल्यू द्वारा उजागर संपत्तियों की श्रृंखला में कान्हा की ये ज़मीनें अब एक नई कड़ी बन चुकी हैं। पर्यटन क्षेत्र से सटे इन भूखंडों की संभावित वाणिज्यिक उपयोगिता और नाममात्र भू-राजस्व दर यह दर्शाते हैं कि भ्रष्टाचार सिर्फ नगद या सोने तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनों के माध्यम से भी निवेश और कालेधन की सफेदी की जा रही थी।

क्या कान्हा के भीतर भी सरकारी रसूख का उपयोग कर भूमाफिया जैसे तरीकों से ज़मीनें हड़पी गईं?
क्या विभागीय अधिकारियों को इन ज़मीनों की जानकारी नहीं थी?
क्या इन ज़मीनों की खरीद-फरोख्त में भी अन्य प्रभावशाली अधिकारी शामिल थे?

जनता का आक्रोश – अब और पर्दा उठना चाहिए

इस खुलासे के बाद आम जनता का आक्रोश और गहराता जा रहा है। सभी की निगाहें अब इस बात पर हैं कि क्या इस कार्रवाई का दायरा और बढ़ेगा? क्या अन्य विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में आएगी?

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