28 दिनों तक भगवान भरोसे रही मवई की शिक्षा व्यवस्था, अब घुघरी के बीईओ को सौंपा गया अतिरिक्त प्रभार

Revanchal
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न शिक्षक पूरे, न अधिकारी नियमित… आखिर बैगा अंचल के बच्चों का भविष्य कब तक रहेगा ‘प्रभारियों’ के भरोसे?


दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
मंडला जिले के दूरस्थ, बैगा एवं आदिवासी बाहुल्य विकासखंड मवई की शिक्षा व्यवस्था आखिरकार प्रशासन की नजर में 28 दिन बाद आई। 30 जून 2026 को विकासखंड शिक्षा अधिकारी हरेसिंह परते के सेवानिवृत्त होने के बाद पूरा विकासखंड बिना नियमित बीईओ के चलता रहा। इस दौरान न तो स्थायी नियुक्ति हुई और न ही तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई।
अब 28 जुलाई को कार्यालय सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग मंडला द्वारा जारी आदेश के माध्यम से घुघरी के विकासखंड शिक्षा अधिकारी एल.एस. उइके को उनके मूल कार्य के साथ-साथ मवई का अतिरिक्त प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रभार भी सौंप दिया गया है। आदेश को कलेक्टर की स्वीकृति के बाद तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यही है आदिवासी और बैगा अंचल की शिक्षा के प्रति प्रशासन की प्राथमिकता?


28 दिन तक कौन देख रहा था शिक्षा तंत्र?
वही मवई जैसे वनांचल और पिछडे संवेदनशील विकासखंड में हजारों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। दर्जनों प्राथमिक, माध्यमिक, हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी विद्यालय संचालित हैं। ऐसे में जब बीईओ का पद रिक्त था, तब विद्यालयों के निरीक्षण, शिक्षकों की जवाबदेही, शैक्षणिक गुणवत्ता, वित्तीय कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों की निगरानी कौन कर रहा था? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन को देना चाहिए।
एक अधिकारी, दो विकासखंड… क्या यह संभव है?


घुघरी और मवई दोनों ही भौगोलिक दृष्टि से बड़े, दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्र हैं। दोनों स्थानों के बीच लंबी दूरी है और अनेक विद्यालय जंगल एवं दुर्गम क्षेत्रों में स्थित हैं। ऐसे में एक ही अधिकारी से दोनों विकासखंडों की नियमित मॉनिटरिंग, निरीक्षण, बैठकों का संचालन, वित्तीय कार्यवाही और शैक्षणिक गुणवत्ता की निगरानी की अपेक्षा करना व्यवहारिक रूप से कठिन माना जा रहा है।


बच्चों का भविष्य आखिर किसके भरोसे?
जिले के कई विद्यालय पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कहीं एक शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल चल रहा है तो कहीं विषय विशेषज्ञों के पद वर्षों से रिक्त हैं। अब अधिकारी भी नियमित नहीं, बल्कि अतिरिक्त प्रभार पर चलेंगे। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर बैगा और आदिवासी बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा?
क्या सरकार की योजनाओं में आदिवासी बच्चों की शिक्षा केवल कागजों तक सीमित रह गई है? क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल शहरी क्षेत्रों के लिए है और दूरस्थ अंचलों के बच्चों को केवल “प्रभार व्यवस्था” ही नसीब होगी?


प्रभार संस्कृति कब होगी खत्म?
मंडला जिले में लंबे समय से कई विभाग अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग में भी यदि स्थायी अधिकारियों की नियुक्ति समय पर नहीं हो रही है तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अतिरिक्त प्रभार केवल कुछ दिनों की अस्थायी व्यवस्था हो सकती है, लेकिन यदि यही व्यवस्था महीनों तक चलती रही तो इसका सीधा असर विद्यालयों की कार्यप्रणाली, बच्चों की पढ़ाई और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर पड़ेगा।


जनहित का सवाल
बैगा और आदिवासी अंचल के बच्चों को भी उतनी ही बेहतर शिक्षा का अधिकार है जितना प्रदेश के अन्य बच्चों को। ऐसे में जिला प्रशासन और जनजातीय कार्य विभाग से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि मवई में शीघ्र नियमित विकासखंड शिक्षा अधिकारी की पदस्थापना की जाए, रिक्त शिक्षकों के पद भरे जाएं और शिक्षा व्यवस्था को केवल “प्रभार” नहीं बल्कि स्थायी नेतृत्व दिया जाए।
अब सवाल यही है—क्या बैगा अंचल के बच्चों का भविष्य हमेशा प्रभारियों के भरोसे ही चलता रहेगा, या फिर सरकार और प्रशासन शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे?

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