मनरेगा खत्म, मजदूर बेहाल : क्या ग्रामीण भारत को अंधेरे में धकेल रही है सरकार?

Revanchal
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आलेख : विक्रम सिंह

दैनिक रेवाँचल टाइम्स
ग्रामीण भारत की जीवनरेखा कही जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। जिस कानून ने करोड़ों गरीब परिवारों को “काम का अधिकार” दिया, उसी को धीरे-धीरे खत्म कर अब एक अस्पष्ट और गैर-जवाबदेह व्यवस्था ‘वीबी-ग्राम (जी)’ थोप दी गई है।


यह केवल एक योजना का बदलाव नहीं, बल्कि गरीबों के संवैधानिक अधिकार पर सीधा प्रहार है।
एक तरफ सरकार दावे कर रही है कि ग्रामीण विकास उसकी प्राथमिकता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी सच्चाई यह है कि गांवों में मजदूर काम के लिए भटक रहे हैं। हालात इतने बदतर हैं कि मजदूर काम मांग रहे हैं, लेकिन अधिकारी साफ कह रहे हैं—“मनरेगा में अब काम नहीं मिलेगा।”


सबसे बड़ा सवाल—फिर मिलेगा कहां?
इसका जवाब सरकार के पास भी नहीं, और प्रशासन के पास भी नहीं।
कागजों में योजना, जमीन पर सन्नाटा
मनरेगा एक मांग-आधारित कानून था, जिसमें काम देना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी थी। लेकिन नई व्यवस्था में इसे बजट-आधारित योजना बनाकर इसकी आत्मा ही खत्म कर दी गई है।


95,000 करोड़ रुपये का बजट दिखाकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती, क्योंकि हकीकत यह है कि यह राशि नाकाफी है और राज्यों पर 40% का अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया है। ऐसे में गरीब राज्यों की हालत और खराब होना तय है।


मजदूरों के साथ सबसे बड़ा धोखा
स्थिति इतनी गंभीर है कि अप्रैल 2026 तक मजदूरों के पास न तो मनरेगा का कानूनी अधिकार बचा है, और न ही नई योजना के नियम बने हैं। यानी—
न कानून, न काम, न मजदूरी”
क्या इससे बड़ा मजाक ग्रामीण मजदूरों के साथ हो सकता है?
आंकड़े भी दे रहे हैं चेतावनी
अप्रैल 2026 तक कार्य दिवस मात्र 95 लाख—पिछले साल के 4% के बराबर
10,000 करोड़ रुपये से अधिक मजदूरी भुगतान लंबित रोजगार के औसत दिन घटकर 43 दिन, 100 दिन रोजगार पाने वाले परिवारों में लगभग 40% गिरावट
ये आंकड़े नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की असफलता का चार्जशीट हैं।


जमीनी हकीकत: काम बंद, भुगतान बंद
देशभर में लाखों काम अधूरे पड़े हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 12 लाख से अधिक कार्य अधूरे हैं और हजारों करोड़ का भुगतान अटका हुआ है।
अधिकारियों की स्थिति भी असमंजस भरी है—ऊपर से निर्देश हैं कि काम न दिया जाए, नीचे मजदूर जवाब मांग रहे हैं।


क्या साठगांठ से खत्म की गई जीवनरेखा?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में न तो व्यापक चर्चा हुई और न ही पारदर्शिता दिखाई गई। जिस तेजी से कानून लाया गया, उसी तेजी से मजदूरों का अधिकार छीन लिया गया।


यह सवाल उठना लाजमी है—
क्या यह सब जानबूझकर किया गया ताकि ग्रामीण गरीबों की आवाज कमजोर हो जाए?
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला
मनरेगा सिर्फ रोजगार योजना नहीं थी, यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी। इसके कमजोर होने का मतलब है—


गांवों में क्रय शक्ति में गिरावट
पलायन में वृद्धि
सामाजिक असमानता में बढ़ोतरी
अब भी वक्त है
यदि सरकार ने समय रहते इस दिशा में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में ग्रामीण भारत गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट में फंस सकता है।
जरूरत है कि—


मनरेगा को मजबूत रूप में बहाल किया जाए रोजगार की कानूनी गारंटी सुनिश्चित की जाए लंबित मजदूरी का तत्काल भुगतान हो न्यूनतम मजदूरी को सम्मानजनक स्तर तक बढ़ाया जाए
अन्यथा यह मान लेना चाहिए कि सरकार ने ग्रामीण भारत को उसके हाल पर छोड़ दिया है।


15 मई को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान
खेत मजदूर संगठनों और नरेगा संघर्ष मोर्चा ने इस अन्याय के खिलाफ 15 मई को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। उनकी मांग है—
200 दिन रोजगार और 700 रुपये दैनिक मजदूरी।

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