फाइलें गायब, पीड़ित न्याय के लिए भटक रहे, जवाब देने से बच रहा प्रशासन
रेवांचल टाइम्स घुघरी मंडला जिले की घुघरी तहसील एक बार फिर आरोपों और प्रशासनिक अव्यवस्था को लेकर चर्चा में है। राजस्व मामलों से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों के गायब होने, नामांतरण प्रकरणों में कथित अनियमितताओं और वर्षों से न्याय के लिए भटक रहे ग्रामीणों की पीड़ा ने तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब पीड़ित पक्ष अपनी फाइलों और प्रकरणों की जानकारी लेने तहसील कार्यालय पहुंचता है तो उन्हें स्पष्ट जवाब देने के बजाय केवल यह कहकर टाल दिया जाता है कि फाइल नहीं मिल रही है।

सूत्रों ने प्राप्त जानकारी अनुसार घुघरी तहसील में आम जनता के राजस्व संबंधी मामलों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। जमीन, नामांतरण, बंटवारा और रिकॉर्ड से जुड़े मामलों में लोग वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, लेकिन समाधान के बजाय उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है। लगातार सामने आ रहे मामलों ने राजस्व विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
चार साल से नकल के लिए भटक रही ग्यारसी बाई
तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला सबसे बड़ा मामला ग्राम खमतरा निवासी ग्यारसी बाई यादव का है। पीड़ित महिला के अनुसार वह तीन बहनों में से एक हैं और पैतृक संपत्ति पर तीनों बहनों का समान अधिकार बनता है। लेकिन नामांतरण और जमीन संबंधी रिकॉर्ड में कथित विसंगतियों के कारण उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है।ग्यारसी बाई का कहना है कि वह वर्ष 2023 से लगातार तहसीलदार द्वारा पारित नामांतरण आदेश की प्रमाणित नकल प्राप्त करने के लिए आवेदन कर रही हैं।
उनका उद्देश्य दस्तावेजों के आधार पर अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई लड़ना है, लेकिन पिछले कई वर्षों से उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं। हर बार जब वह तहसील कार्यालय पहुंचती हैं तो उन्हें यही जवाब दिया जाता है कि संबंधित फाइल उपलब्ध नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी अभिलेखों में दर्ज एक महत्वपूर्ण राजस्व प्रकरण की फाइल आखिर गायब कैसे हो सकती है यदि फाइल वास्तव में गायब है तो उसकी जवाबदेही किसकी है और यदि फाइल मौजूद है तो पीड़ित को उसकी नकल क्यों नहीं दी जा रही। इन सवालों का जवाब न तो तहसील प्रशासन के पास है और न ही संबंधित अधिकारियों के पास।
एक भाई के नाम दर्ज हो गई पूरी पैतृक जमीन
घुघरी तहसील से जुड़ा दूसरा मामला और भी निराला बताया जा रहा है। घुघरी निवासी दुर्गेश सिंह ठाकुर और भरत सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया है कि उनके परिवार की पैतृक जमीन नियमों के विपरीत केवल एक भाई के नाम दर्ज कर दी गई।
परिवार में चार भाई और दो बहनें होने के बावजूद पूरी जमीन का नामांतरण कथित रूप से केवल विजय सिंह ठाकुर के नाम कर दिया गया। पीड़ितों का कहना है कि पैतृक संपत्ति पर सभी उत्तराधिकारियों का समान अधिकार होता है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में इस मूल सिद्धांत की अनदेखी की गई।
दुर्गेश सिंह और भरत सिंह का आरोप है कि जब उन्होंने इस मामले की जानकारी लेने और अपने अधिकारों के संबंध में तहसील कार्यालय में संपर्क किया तो उन्हें स्पष्ट जानकारी देने के बजाय बार-बार चक्कर कटवाए जा रहे है उनका कहना है कि वर्षों से वे अपने हिस्से और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन उनकी सुनने को तैयार नहीं है।
पीड़ितों का सवाल है कि यदि परिवार में छह वैधानिक उत्तराधिकारी मौजूद हैं तो पूरी संपत्ति एक व्यक्ति के नाम कैसे दर्ज हो गई क्या इस प्रक्रिया में दस्तावेजों की जांच नहीं हुई क्या संबंधित अधिकारियों ने नियमों का पालन किया ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब अभी तक सामने नहीं आया है।
फाइलें गायब होना महज लापरवाही या बड़ा खेल
राजस्व विभाग में फाइलों का गायब होना कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं माना जाता। जमीन और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज कानूनी रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर ही स्वामित्व, नामांतरण, बंटवारा और अधिकार तय किए जाते हैं।
ऐसे में यदि तहसील कार्यालय से महत्वपूर्ण फाइलें गायब हो रही हैं तो यह केवल लापरवाही का मामला नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता माना जा सकता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ मामलों में रिकॉर्ड गायब होने के पीछे सुनियोजित तरीके से गड़बड़ियों को छिपाने का प्रयास भी हो सकता है। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं रहेंगे तो आम नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा कैसे कर पाएंगे। राजस्व अभिलेखों का संरक्षण प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही सीधे जनता के अधिकारों को प्रभावित करती है।
तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
लगातार सामने आ रहे मामलों ने तहसील प्रशासन की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। लोगों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद मामलों का निराकरण नहीं किया जा रहा है। कई बार आवेदन देने के बाद भी जवाब नहीं मिलता और जब जानकारी मांगी जाती है तो फाइल गायब होने का बहाना बना दिया जाता है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी फाइल का पता नहीं चल रहा है तो संबंधित अधिकारी को तत्काल जांच बैठाकर जिम्मेदार कर्मचारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। साथ ही रिकॉर्ड की पुनः तलाश, डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई भी की जानी चाहिए। लेकिन यहां ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है।
कि फाइलों के गायब होने, नामांतरण में कथित गड़बड़ियों और राजस्व रिकॉर्ड में हुई विसंगतियों की उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए।
सूत्रों का यह भी कहना है कि यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या पटवारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
बड़ा सवाल
घुघरी तहसील के इन मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर गरीब और आम नागरिक न्याय के लिए जाएं तो जाएं कहां जब सरकारी कार्यालयों से ही फाइलें गायब होने लगें, रिकॉर्ड पर सवाल उठने लगें और शिकायतों का समाधान न हो तो लोगों का भरोसा व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि इन आरोपों को महज एक और शिकायत मानकर फाइलों में दबा दिया जाता है या फिर निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाती है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह मामला केवल कुछ पीड़ित परिवारों का नहीं बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल बन सकता है।
वही जब इस संबंध में तहसीलदार घुघरी से उनका पक्ष जानना चाहा दो बार कॉल किया गया पर उनके द्वारा फोन कॉल रिसीव नही किया गया ।
