किसानों और विभागीय कार्यों पर पड़ रहा असर
रेवांचल टाइम्स बिछिया मंडला शासन द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए निर्मित शासकीय आवासों का उद्देश्य केवल पदस्थापना अवधि के दौरान आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना होता है। स्थानांतरण या पदमुक्ति के बाद संबंधित अधिकारी या कर्मचारी को निर्धारित समय सीमा में शासकीय आवास खाली करना अनिवार्य होता है। लेकिन बिछिया विकासखंड में उद्यानिकी विभाग से जुड़ा एक मामला प्रशासनिक व्यवस्था और नियमों के पालन पर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि तत्कालीन उद्यान विकास अधिकारी श्रीमती रोशनी उइके द्वारा शासकीय आवास लंबे समय से खाली नहीं किया गया है, जिसके कारण विभागीय कार्य प्रभावित हो रहे हैं और किसानों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी, बिछिया का कार्यालय संचालन कृषक प्रशिक्षण सह कार्यालय भवन से किया जाता है। यह भवन विभागीय बैठकों, किसानों के प्रशिक्षण और कार्यालयीन कार्यों के लिए उपयोग में लाया जाता रहा है। विभाग के पास किसानों के बैठने और बैठकों के आयोजन के लिए पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। ऐसे में संबंधित शासकीय आवास और भवन का उपयोग विभागीय गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार श्रीमती रोशनी उइके के स्थानांतरण के बाद भी संबंधित शासकीय आवास आज तक खाली नहीं किया गया है। बताया जा रहा है कि लगभग एक वर्ष तीन माह बीत जाने के बाद भी आवास पर कब्जा बना हुआ है। इस कारण कार्यालय संचालन, किसानों की बैठकें और अन्य विभागीय गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। कर्मचारियों का कहना है कि सीमित संसाधनों के बीच विभाग को कार्य करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शासकीय आवास खाली कराने के लिए विभागीय स्तर पर कई बार पत्राचार किया जा चुका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार उद्यान अधीक्षक शासकीय उद्यान सिझोरा तथा कार्यालयीन उद्यान संस्था मंडला द्वारा संबंधित अधिकारी को आठ बार लिखित पत्र भेजे गए हैं। इन पत्रों में स्पष्ट रूप से आवास खाली करने के निर्देश दिए गए, लेकिन इसके बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
पत्राचार में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि शासकीय आवास निर्धारित समय सीमा में खाली नहीं किया जाता है तो मूलभूत नियम 45-बी के तहत निर्धारित किराए की दर से दोगुना किराया वसूल किया जाएगा। साथ ही मध्यप्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1974 एवं 1975 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
इस पूरे मामले ने विभागीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जब किसी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी को बार-बार नोटिस जारी किए जाने के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो नियमों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आम नागरिक किसी सरकारी भूमि या भवन पर कब्जा करता है तो प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता है, लेकिन जब मामला किसी अधिकारी से जुड़ा हो तो कार्रवाई वर्षों तक लंबित क्यों रहती है?
किसानों का भी कहना है कि विभागीय भवनों का उपयोग कृषि एवं उद्यानिकी से संबंधित प्रशिक्षण, योजनाओं की जानकारी और बैठकों के लिए होना चाहिए। यदि भवन उपलब्ध नहीं होंगे तो इसका सीधा असर किसानों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ेगा। क्षेत्र के किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि शासकीय संपत्तियों का उपयोग केवल शासन के निर्धारित उद्देश्यों के लिए सुनिश्चित किया जाए और नियमों का पालन सभी के लिए समान रूप से कराया जाए।
प्रशासनिक हलकों में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब आठ बार पत्राचार के बाद भी आवास खाली नहीं कराया जा सका तो आखिर जिम्मेदार अधिकारी किस स्तर पर कार्रवाई करने से बच रहे हैं। यदि नियमों के अनुसार दोगुना किराया वसूली और बेदखली की प्रक्रिया लागू होनी थी तो अब तक उसका क्रियान्वयन क्यों नहीं हुआ।
यह मामला केवल एक शासकीय आवास तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी संपत्तियों के प्रबंधन और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा प्रश्न भी है। शासन द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर निर्मित भवनों और आवासों का उपयोग जनहित और शासकीय कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। यदि नियमों की अनदेखी होती रही तो इससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होगी, बल्कि सरकारी संपत्तियों के दुरुपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।
अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या विभागीय पत्राचार और चेतावनियां केवल कागजों तक सीमित रहेंगी या फिर नियमों के तहत वास्तविक कार्रवाई कर शासकीय आवास को मुक्त कराया जाएगा। साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि शासन की संपत्ति पर लंबे समय से बने कथित कब्जे को हटाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी कब और क्या कदम उठाते हैं। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक उदासीनता और नियमों के पालन को लेकर गंभीर बहस का विषय बना हुआ है।
