वेतन के नाम पर वसूली का खेल प्रभारी प्राचार्य पर ₹25 हजार रिश्वत मांगने का आरोप

Revanchal
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छह माह से बिना वेतन तड़प रहा कंप्यूटर ऑपरेटर

रेवांचल टाइम्स मंडला। शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले सरकारी विद्यालय यदि भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएं तो यह केवल एक कर्मचारी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का दुर्भाग्य है। मंडला जिले के शासकीय हाई स्कूल खड़देवरा (संकुल केंद्र हिरदेनगर) से सामने आया मामला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। विद्यालय में कार्यरत अंशकालीन कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार परते ने उप प्रभारी प्राचार्य कालका प्रसाद ठाकुर पर वेतन पत्रक बनाने के बदले ₹25 हजार रिश्वत मांगने का सनसनीखेज आरोप लगाया है।


पीड़ित ने जिला कलेक्टर मंडला को लिखित आवेदन देकर आरोप लगाया है कि वह 1 फरवरी 2026 से लगातार विद्यालय में सेवाएं दे रहा है, लेकिन आज तक उसे एक रुपये का भी वेतन नहीं मिला। कारण सिर्फ इतना बताया गया कि पहले “सेवा शुल्क” दो, तभी वेतन मिलेगा।
आवेदन के अनुसार, प्रभारी प्राचार्य ने वेतन पत्रक तैयार करने और वेतन निकलवाने के लिए ₹25 हजार की मांग की। आर्थिक रूप से कमजोर कर्मचारी ने किसी तरह उधार लेकर पहले ₹3 हजार और बाद में ₹7 हजार, कुल ₹10 हजार दे दिए। लेकिन रिश्वत की भूख यहीं नहीं रुकी। आरोप है कि अब भी ₹15 हजार की मांग की जा रही है और रकम नहीं देने पर उसे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है।

रिश्वत नहीं दी तो छिपा दिए कंप्यूटर और रिकॉर्ड

पीड़ित का आरोप है कि शेष रकम नहीं देने पर प्रभारी प्राचार्य ने उसके उपयोग में आने वाले कंप्यूटर और लैपटॉप तक छिपा दिए, जरूरी रिकॉर्ड अपने कब्जे में ले लिया और बार-बार मानसिक दबाव बनाते हुए कहा जा रहा है कि पहले “स्थायी आदेश” लेकर आओ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अंशकालीन कर्मचारियों की नियुक्ति मजदूरी दर पर होती है, तब स्थायी आदेश की मांग आखिर किस नियम के तहत की जा रही है क्या यह केवल वेतन रोकने और कथित वसूली का हथियार बनाया गया।

सरकारी वेतन कम पड़ गया, अब अधीनस्थों से वसूली

सरकार सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को जनता की सेवा के लिए वेतन देती है, न कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से कथित वसूली करने के लिए। यदि एक गरीब कंप्यूटर ऑपरेटर से उसका वैधानिक वेतन दिलाने के बदले रिश्वत मांगी जाती है, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ भी अपराध है।


आखिर छह महीने तक बिना वेतन कोई कर्मचारी अपना परिवार कैसे चलाए। बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया, राशन और रोजमर्रा का खर्च कौन उठाए। क्या शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद रखी गईं।
जिम्मेदार कौन यदि शिकायत सही है तो सवाल केवल एक प्रभारी प्राचार्य पर नहीं उठता। सवाल उन अधिकारियों पर भी उठता है जिनकी जिम्मेदारी विद्यालयों की निगरानी करना है। आखिर छह महीने तक वेतन पत्रक लंबित रहा तो विकासखंड शिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की। क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि कर्मचारी को वेतन क्यों नहीं मिल रहा।


कलेक्टर से न्याय की गुहार
पीड़ित ने जिला कलेक्टर से मांग की है
कि कथित रूप से दिए गए ₹10 हजार वापस दिलाए जाएं।
छह माह का लंबित वेतन तत्काल जारी कराया जाए।वेतन पत्रक तुरंत तैयार कर संबंधित कार्यालय भेजा जाए।पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पाए जाने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं विभागीय नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई की जाए।

अब प्रशासन की परीक्षा यह मामला अब केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि जिला प्रशासन की निष्पक्षता की परीक्षा बन गया है। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह शिक्षा विभाग में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण होगा। वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो तथ्यों के आधार पर संबंधित अधिकारी को भी न्याय मिलना चाहिए।


फिलहाल शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। लेकिन इतना तय है कि यदि एक कर्मचारी को अपना ही वेतन पाने के लिए रिश्वत देने का आरोप लगाना पड़ रहा है, तो व्यवस्था में कहीं न कहीं खामी जरूर है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में केवल जांच का आश्वासन देता है या फिर भ्रष्टाचार पर वास्तव में कठोर प्रहार करता है।

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