रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में काम करने वाले 73 साप्ताहिक मजदूरों के अप्रैल महीने की मजदूरी का भुगतान लम्बी जद्दोजहद के बाद आखिर कर दिया गया। लेकिन खास बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन साप्ताहिक श्रमिकों की कर्मचारी संघ के सदस्य बनने की मांग को अमान्य करते हुए उनकी मजदूरी से संघ सदस्यता राशि की कटौती को अमान्य कर दिया और बिना कटौती के पूर्वानुसार भुगतान उन्हें कर दिया गया।
गौरतलब है कि कर्मचारी संघ के अध्यक्ष संजय यादव और महासचिव अंकित श्रीवास ने इन 73 मजदूरों को विश्वविद्यालय कर्मचारी बताते हुए मजदूरों के प्रभारी अधिकारी डॉ० विशाल बन्ने से देयक का सत्यापन करते हुए संघ सदस्यता राशि 10 रूपये भी बगैर प्रशासनिक स्वीकृति के कटवाकर लेखा शाखा को भुगतान प्रस्तुत किया गया था। लेखा शाखा से भी आनन-फानन में बिना देखे भुगतान अग्रेषित कर दिया लेकिन जब कुलगुरू प्रो० राजेश कुमार वर्मा और कुलसचिव रविशंकर सोनवाल को प्रकरण की वस्तुस्थिति से अवगत करवाया गया तो दोनाे अधिकारियों ने मामले को संज्ञान में लेते हुए विवादित नस्ती को जब्त कर लिया और कर्मचारी संघ की सदस्यता की कटौती किये बगैर भुगतान नये सिरे से प्रस्तावित करने के निर्देश दिये।
मजदूर स्वयं चाह रहे थे कि ना हो भुगतान
मजे की बात यह है कि कुछ मजदूरों को छोड़ दे तो लगभग सभी यह नहीं चाह रहे थे कि संघ की सदस्यता राशि की कटौती के बगैर उन्हें मजदूरी का भुगतान हो ताकि विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव बनाने की दृष्टि से मामला विवादित बना रहे।
सूत्रों की मानें तो इसके लिये मजदूरों की पैरवी करने वालो ने अडंगे लगवाने मे हर संभव प्रयास किये, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को भांपते हुए कड़ा रूख अपनाया और सभी 73 मजदूरों की मजदूरी उनके खातों में हस्तांतरित कर दी गई। पिछले दो सप्ताह से चल रहे इस नाटकीय घटनाक्रम में बहरहाल यह तो तय है कि 73 साप्ताहिक मजदूरों और उनको कर्मचारी संघ का सदस्य बनाने का सपना दिखाने वालों के मंसूबे पर पानी फिर गया।
नियमों को ताक पर रखकर भुगतान प्रस्तावित करने वालों के विरूद्ध विश्वविद्यालय प्रशासन क्या कार्यवाही करता है यह देखने वाली बात होगी।
