जबलपुर में स्कूली बच्चों की जान से खिलवाड़ करने वाले तीन वाहन जब्त

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर।
स्कूल जाने वाले बच्चे हर सुबह घर से निकलते हैं तो माता-पिता उन्हें भरोसे के साथ वाहन में बैठाते हैं। यह भरोसा सिर्फ ड्राइवर पर नहीं होता, बल्कि उस व्यवस्था पर भी होता है जो कहती है कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भरोसा सचमुच सुरक्षित है?


जबलपुर के पाटन क्षेत्र में परिवहन विभाग की कार्रवाई ने इसी भरोसे की परतें खोल दी हैं। जांच में तीन ऐसे वाहन पकड़े गए जो नियमों को पीछे छोड़कर बच्चों को स्कूल पहुंचाने का काम कर रहे थे। दो मारुति वैन में बिना वैध अनुमति गैस किट लगी हुई थी, जबकि तीसरा वाहन अपनी उम्र पूरी कर चुका था, लेकिन फिर भी मासूम बच्चों को ढो रहा था।


आरटीओ रिंकू शर्मा के निर्देश पर चली इस कार्रवाई में MP20ZG6830, MP20ZD4047 और MP20T6239 नंबर के वाहनों को जब्त कर आरटीओ परिसर में खड़ा कर दिया गया। लेकिन सवाल सिर्फ तीन वाहनों का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा अहमियत कमाई को दी जाती है।


गाड़ी नहीं, चलता-फिरता खतरा


जांच के दौरान सामने आया कि दो मारुति वैन में अवैध गैस किट लगाकर बच्चों का परिवहन किया जा रहा था। गैस किट लगाना अपने आप में अपराध नहीं है, लेकिन बिना निर्धारित मानकों और अनुमति के ऐसा करना सीधे-सीधे बच्चों की जान को जोखिम में डालना है।
ज़रा सोचिए… जिन वाहनों में हर दिन दर्जनों मासूम सफर करते हैं, अगर उनमें तकनीकी खामी या हादसा हो जाए तो जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या कुछ रुपये बचाने के लिए बच्चों की जिंदगी दांव पर लगाई जा सकती है?


16 साल पुरानी गाड़ी, लेकिन बच्चों की जिम्मेदारी नई
कार्रवाई के दौरान एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया। MP20T6239 नंबर का वाहन 16 वर्ष से अधिक पुराना होने के बावजूद स्कूली बच्चों को ढो रहा था। नियम साफ कहते हैं कि ऐसी गाड़ियों का उपयोग स्कूल परिवहन में नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद वह सड़क पर दौड़ रही थी।
यानी नियम किताबों में थे और वाहन सड़क पर।
कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल बाकी हैं
परिवहन विभाग की कार्रवाई निश्चित रूप से जरूरी थी और स्वागत योग्य भी। आरटीओ रिंकू शर्मा ने साफ कहा है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा और ऐसे अभियान आगे भी जारी रहेंगे।
लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी खड़ा है…ये वाहन आखिर इतने दिनों से बिना रोक-टोक कैसे चल रहे थे? क्या इनकी कभी जांच नहीं हुई? क्या स्कूल प्रबंधन ने इन वाहनों की वैधता की पुष्टि की? और सबसे अहम, क्या अभिभावकों को यह पता था कि जिन वाहनों में उनके बच्चे रोज सफर कर रहे हैं, वे खुद सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते?


क्योंकि बच्चों की सुरक्षा केवल परिवहन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें स्कूल, वाहन संचालक, प्रशासन और समाज…सभी की बराबर हिस्सेदारी है।
और जब बात बच्चों की जान की हो, तब नियमों को विकल्प नहीं, अनिवार्यता माना जाना चाहिए।

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