बुरी तरह चरमराई पशु चिकित्सा व्यवस्था: बेहोशी में जवाबदार, बेजुबान पशु भुगत रहे अफसरों की लापरवाही!

Revanchal
4 Min Read


सरकार करोड़ों खर्च कर रही, लेकिन मंडला में पशु इलाज भगवान भरोसे — डॉक्टर गायब, अस्पताल खाली, सड़कों पर तड़पते बेजुबान


दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
मंडला जिले में पशु चिकित्सा व्यवस्था अब सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह गई है। आदिवासी बहुल इस जिले में, जहां हजारों परिवारों की आजीविका पशुपालन पर टिकी है, वहीं पशु बीमार पड़ते ही उनकी जिंदगी भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है। सरकारी दावे चाहे जितने बड़े हों, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि पशु चिकित्सालयों में डॉक्टर नहीं, दवाएं सीमित, स्टाफ नदारद और जवाबदार अधिकारी गहरी नींद में हैं।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार पशुपालन और पशुधन विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो आखिर यह पैसा जा कहां रहा है? यदि योजनाओं का लाभ धरातल तक पहुंच रहा होता, तो आज जिले में बीमार पशु सड़कों पर तड़पते नजर नहीं आते और आवारा मवेशी प्लास्टिक, पॉलीथिन, कागज और कचरा खाने को मजबूर नहीं होते।


स्थानांतरण ने तोड़ दी व्यवस्था, डॉक्टरों का टोटा बना अभिशाप
उपसंचालक पशु चिकित्सा विभाग यू.एस. तिवारी स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि हाल ही में 8 पशु चिकित्सकों और 9 सहायक चिकित्सकों का मंडला से स्थानांतरण हो गया, जबकि बदले में केवल 2 डॉक्टर मिले। नतीजा यह है कि एक-एक डॉक्टर को दो से तीन विकासखंडों का प्रभार संभालना पड़ रहा है।
घुघरी, मवई, बिछिया, निवास जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में हालात सबसे अधिक गंभीर हैं। यहां पशुपालकों को कई-कई किलोमीटर तक भटकना पड़ता है, लेकिन समय पर डॉक्टर नहीं मिलते। कई मामलों में इलाज के अभाव में पशुओं की मौत हो जाती है और गरीब परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूट जाती है।


बीमार पशु सड़कों पर, आवारा मवेशियों का बढ़ता जमघट
आज मंडला शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक सड़कों पर बीमार और लावारिस पशुओं का जमघट आम दृश्य बन चुका है। भूख से बेहाल गाय और बैल कूड़े के ढेर में प्लास्टिक, पॉलीथिन और कागज खा रहे हैं। इससे उनकी मौतें बढ़ रही हैं, लेकिन विभाग के जिम्मेदारों को न यह दिखाई दे रहा है और न ही कोई ठोस अभियान नजर आता है।


कागजों में योजनाएं, जमीन पर दम तोड़ता पशुधन
एक ओर पशुधन विकास, पशु बीमा, टीकाकरण और किसान कल्याण योजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर पशु चिकित्सालयों में मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि डॉक्टर ही नहीं होंगे, तो योजनाओं का लाभ कौन देगा?
क्या करोड़ों की योजनाओं पर बैठ गई है लापरवाही की धूल?


जिले में चर्चा है कि सरकार से आने वाले बजट का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा। कई स्थानों पर पशु चिकित्सा केंद्र बदहाल हैं, संसाधनों का अभाव है और व्यवस्थाएं कमजोर हैं। यदि ऐसा है, तो यह जरूरी है कि संबंधित वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों की निष्पक्ष समीक्षा हो, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि योजनाओं के लिए उपलब्ध कराए गए संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया गया और कहां सुधार की आवश्यकता है।
जनता पूछ रही है जवाब
आखिर आदिवासी बहुल मंडला में पशु चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?


खाली पड़े पद कब भरेंगे?
बीमार पशुओं को समय पर इलाज कब मिलेगा?
सड़कों पर पॉलीथिन खाने को मजबूर गायों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जमीनी हालात इतने बदतर क्यों हैं?
जब तक पशुपालन विभाग कागजी उपलब्धियों से बाहर निकलकर धरातल पर काम नहीं करेगा, तब तक बेजुबान पशु तड़पते रहेंगे, पशुपालक बर्बाद होते रहेंगे और सरकार की कल्याणकारी योजनाएं केवल फाइलों की शोभा बनकर रह जाएंगी।

👁️ 27 views Views
Share This Article
Translate »