आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान
दैनिक रेवाँचल टाईम्स- मंडला। मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों, किसानों और वन आश्रित समुदायों को उनकी खेती की जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल करने की प्रक्रिया लगातार तेज होती जा रही है। मंडला जिले में प्रस्तावित चुटका परमाणु विद्युत परियोजना, बसनिया (ओढारी) बहुउद्देशीय बांध, अपर बुढ़नेर बांध, नारायणगंज एवं बीजाडांडी क्षेत्र में प्रस्तावित पम्प्ड स्टोरेज (हाइड्रो पावर) परियोजनाएं तथा राजा दलपत शाह अभयारण्य जैसी योजनाएं हजारों आदिवासी परिवारों के अस्तित्व, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट पैदा कर रही हैं। बीजाडांडी और नारायणगंज क्षेत्र के किसान पिछले एक दशक से बरगी बांध से लिफ्ट सिंचाई परियोजना लागू करने की मांग को लेकर संघर्षरत हैं।जबकि 2023 में लिफ्ट सिंचाई की घोषणा के बाद भी अभी तक कोई प्रगति नहीं हुआ है।
इन्हीं सभी मुद्दों को लेकर कल चुटका गांव में आयोजित एक दिवसीय महा बैठक में बड़ी संख्या में आदिवासी, किसान, महिलाएं, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता तथा जनप्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि क्षेत्र के लोगों के संवैधानिक अधिकारों, प्राकृतिक संसाधनों और आजीविका की रक्षा के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा तथा लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष को और मजबूत किया जाएगा।क्षेत्र के वरिष्ठ समाजिक कार्यकर्ता मोले सिंह गोठरिया ने प्रस्ताव रखा कि शंकरशाह और रघुनाथ शाह के बलिदान भूमि जबलपुर से संघर्ष के हूंकार का शंखनाद किया जाए।एक लम्बे संघर्ष की तैयारी के साथ जबलपुर और भोपाल में घेरा डालो डेरा डालो कार्यक्रम चलाया जाए।
इस प्रस्ताव का सभी लोगों ने हाथ उठाकर समर्थन किया। राजीव गाँधी पंचायती राज संगठन जबलपुर के विवेक अवस्थी ने जबलपुर और भोपाल में प्रस्तावित संघर्ष का पूरा समर्थन किया। सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि संविधान की पांचवीं अनुसूची, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा कानून) तथा वनाधिकार कानून, 2006 आदिवासी समुदायों को जल, जंगल और जमीन पर उनके पारंपरिक अधिकारों की संवैधानिक गारंटी प्रदान करते हैं। पेसा कानून के अंतर्गत रूढ़ि ग्राम सभा को सर्वोच्च इकाई का दर्जा प्राप्त है। अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी विकास परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग तथा स्थानीय समुदायों को प्रभावित करने वाले निर्णय ग्राम सभा की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति के बिना नहीं लिए जा सकते। वक्ताओं ने कहा कि रूढ़ि ग्राम सभा केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों का आधार है। यदि ग्राम सभा की संवैधानिक शक्तियों को कमजोर किया जाता है तो यह संविधान की मूल भावना तथा आदिवासी स्वशासन की अवधारणा पर सीधा आघात होगा।
विकास मॉडल ऐसा हो जो स्थानीय समुदायों की सहमति, आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों पर आधारित हो।सम्मेलन ने स्पष्ट किया कि आदिवासी समाज विकास का विरोधी नहीं है, बल्कि वह ऐसे विकास का विरोध करता है जो लोगों को उनकी जमीन, जंगल, संस्कृति और जीवन से बेदखल कर दे। सम्मेलन ने सरकार से संवाद, संवैधानिक प्रक्रियाओं के पालन तथा स्थानीय समुदायों की सहमति को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग की है।इस महा बैठक में क्षेत्रीय विधायक चेन सिंह बरकरे, पूर्व विधायक डाक्टर अशोक मर्सकोले, जिला पंचायत सदस्य भूपेंद्र बरकरे, पुष्पा मरकाम, अध्यक्ष जनपद पंचायत मंडला सोनू भलावी,जनपद पंचायत उपाध्यक्ष विजेंद्र यादव, जनपद सदस्य राजेन्द्र पुट्टा, मदन सिंह बरकरे, बजारी यादव, मुन्ना यादव, दुर्गेश लोधी, अजय मरकाम कटनी, अतुल बंजारा, अनुराग सिंगौर, दादु लाल कुङापे, नोने सिंह,जानकी पटेल, रामलला, गहबर सिंह,गुलराज धुमकेती, मीरा बाई मरावी,सोना बाई आदि सैकड़ों महिला पुरूषों की उपस्थिति थी। नर्मदा पार सिवनी जिले से भी भारी संख्या में लोग आए थे। मंच का संचालन बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने किया।
दादु लाल कुङापे (9424305836)
मीरा बाई मरावी (8989943194)
