जबलपुर मंडला पंडरिया नई रेल लाइन, अब होगा अपडेटेड ट्रैफिक सर्वे और फाइनल लोकेशन सर्वे
” ‘सेंट्रल इंडिया कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट’1944 से लंबित मांग को लेकर बेंगलुरु में मंथन: ‘नर्मदा-मैकलसुता-भोरमदेव रेल कॉरिडोर’ के रूप में विकास का प्रस्ताव”
बेंगलुरु, कर्नाटक:
क्षेत्रीय रेल कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर 03/05/2026 रविवार को बेंगलुरु में एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में मंडला के बहुचर्चित रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी और बिलासपुर के मैकेनिकल इंजीनियर IIT Kanpur व रेल एक्टिविस्ट प्रदीप कुमार साहू के बीच मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल और छत्तीसगढ़ को जोड़ने वाली ऐतिहासिक (वर्ष 1944 से लंबित) बिलासपुर-मंडला-जबलपुर नई रेल लाइन विस्तार परियोजना को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।
प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित रही बैठक
बैठक के दौरान दोनों विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि कटघोरा उसलापुर बिलासपुर पंडरिया डोंगरगढ़ रेल लाइन बन रही है इसे पंडरिया से जोड़ना सही साबित होगा ,सर्वे की ऐतिहासिक स्थितिः इस परियोजना का प्रारंभिक इंजीनियरिंग सह ट्रैफिक सर्वे (PETS) वर्ष 2003-04 में पूर्ण हुआ था। उस समय रेलवे बोर्ड ने (-) 5% ROR और संसाधनों की कमी का हवाला देते हुए इसे स्थगित कर दिया था।
समीक्षा की समय-सीमा रेलवे बोर्ड के दिनांक 12.05.2004 के निर्देशानुसार, इस परियोजना की 10 वर्षों के पश्चात समीक्षा की जानी थी। यह अवधि वर्ष 2013-14 में ही पूरी हो चुकी है, किंतु अब तक कोई आधिकारिक पुनरीक्षण (Review Survey) नहीं किया गया है। अगर रेल लाइन की स्वीकृति मिलती है तो आज की डेट में 12-14% का ROR पॉजिटिव आएगा
जबलपुर-मंडला-पंडरिया यह रेल लाइन न केवल समय की बचत करेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को बदल देगी:
1.धार्मिक एवं पर्यटन विकास:- यह रेल मार्ग माँ नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक और नर्मदा परिक्रमा वासियों के लिए एक सुगम कॉरिडोर (Corridor )बनेगा। साथ ही, विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क, जबलपुर के भेड़ाघाट और कवर्धा के ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर के बीच सीधा संपर्क स्थापित होने से क्षेत्रीय पर्यटन को वैश्विक पहचान मिलेगी।वही बिलासपुर के प्रसिद्ध महामाया मंदिर (रतनपुर),
2.क्षेत्रीय विकास: मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों को मुख्य रेल नेटवर्क से जोड़कर वहाँ रोजगार, व्यापार और शिक्षा के नए अवसर पैदा करना प्राथमिकता है।
3.दूरी में कमी: वर्तमान रेल मार्ग की तुलना में इस प्रस्तावित मार्ग से बिलासपुर और जबलपुर के बीच की यात्रा का समय और दूरी काफी कम हो जाएगी। पूरा पूरा 100 किमी लगभग कम होगा (जबलपुर गोंदिया बिलासपुर 517 है)(जबलपुर (कटनी, बिलासपुर 407 किमी है)
4.प्रशासनिक समन्वय: परियोजना को गति देने के लिए दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) और पश्चिम मध्य रेलवे (WCR) के बीच बेहतर तकनीकी और प्रशासनिक समन्वय की आवश्यकता पर चर्चा की गई।
दबाव समूह की भूमिका पर जोर
रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी ने अपनी बात रखते हुए कहा:
“आदिवासी अंचल के लोगों की यह मांग 82 साल पुरानी है, जो 1944 से चली आ रही है।लेकिन विडंबना है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी यह धरातल पर नहीं उतर सकी है। इस ऐतिहासिक मांग को पूरा करने के लिए अब जन-जागरूकता और शासन स्तर पर निरंतर संवाद की आवश्यकता है।
मैंने इस परियोजना को ‘नर्मदा-मैकलसुता-भोरमदेव रेल कॉरिडोर’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा है। यह नाम मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के उन धार्मिक और पर्यटन क्षेत्रों की पहचान है, जिन्हें इस रेल लाइन से नई संजीवनी मिलेगी। यह कॉरिडोर न केवल पटरियों का जाल होगा,
बल्कि हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को जोड़ने वाला सेतु बनेगा, इसलिए ये रेल रेलवे बोर्ड से इस परियोजना के अपडेटेड ट्रैफिक सर्वे (Updated Traffic Survey) और फाइनल लोकेशन सर्वे (FLS) की स्वीकृति चाहिए, और मैंने अपने स्तर अलग-अलग सांसदों और विधायकों से भी चर्चा की है सबका सहयोग चाहिए अब ।”
वहीं,
प्रदीप कुमार साहू (मैकेनिकल इंजीनियर IIT Kanpur एवं रेल एक्टिविस्ट) ने विश्वास जताते हुए कहा:
“तकनीकी दृष्टिकोण से यह रेल लाइन छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बीच एक महत्वपूर्ण ‘लाइफलाइन’ साबित होगी। ब्रिटिश काल में इसे ‘सेंट्रल इंडिया कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट’ का हिस्सा माना गया था, लेकिन विडंबना है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी यह धरातल पर नहीं उतर सकी है।
हमारा प्रस्ताव है कि वर्षों पुरानी इस मांग को अब प्राथमिकता दी जाए ताकि दोनों राज्यों के बीच व्यापारिक और तकनीकी कनेक्टिविटी सुदृढ़ हो सके। यह परियोजना पूरे मध्य भारत के विकास की गति को बदल देगी।”
📝 अगला कदम:
जल्द ही स्थानीय सांसदों, मंत्रियों, रेल मंत्री, GM (बिलासपुर), DRM (नागपुर) और GM (जबलपुर, WCR) को इस संबंध में औपचारिक मांग पत्र और तकनीकी ड्राफ्ट सौंपा जाएगा।
