छाया कश्मीरें आखिर कौन — आदिवासी या पिछड़ा वर्ग?फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे बन बैठी ‘आदिवासी’?

Revanchal
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फर्जी दस्तावेजों के दम पर करोड़ों की जमीनों का खेल?

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/ मंडला में फर्जी जाति प्रमाण पत्र की पहचान की आड़ में एक बड़ा खेल खेला जा रहा हैं जहां पर छाया कश्मीरें नाम की एक गैर आदिवासी महिला अपने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे खुद को आदिवासी बताकर आदिवासी जाति का लाभ लेने और जमीन संबंधी गतिविधियों में संलिप्त हैं।

फर्जी जाति प्रमाण पत्र के दम पर कॉलोनाइजर बन कर करोड़ों की जमीनों पर जमाया कब्जा?

कूटरचित तरीक़े से बनाया गया जाति प्रमाणपत्र

अनुविभागीय अधिकारी राजस्व की पुष्टि पत्र

वही दैनिक रेवांचल टाइम्स की जानकारी के अनुसार, छिंदवाड़ा जिले के परासिया क्षेत्र से मंडला जिले के ग्राम बिनेका निवासी कृष्ण शंकर भारत जाति (सिंघरा) के बेटे से विवाह होकर आई हुई है और आने के पश्चात इनके द्वारा पूर्व में कूटरचित तरीक़े से बनाये गए जाति प्रमाणपत्र के आधार पर बने आदिवासी का लाभ लेकर वतर्मान में संपन्न हुए पंचायतीराज चुनाव में पंच के पद पर चुनाव लड़ी पर हार गई l

पर इसके बाद फिर इनके द्वारा कूटरचित जाति प्रमाणपत्र से बनी आदिवासी से फिर आदिवासियों की भूमि को शिकार बनना शुरू किया गया और फिर मंडला जिले के ग्राम खैरी निवासी दुर्गा वनवासी (बैगा) की भूमि का सौदा किया गया और उसे अब टुकड़े दुकड़े कर महंगे महंगे दामों में बेचा जा रहा है इस कृत्य में इसका पूरा सुसराल पक्ष भूमिका निभा रहा जो स्वयं अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है l

पर बहु छाया कश्मीरे जो कि छिंदवाड़ा जिले के परसिया से बनाये गए जाति प्रमाण पत्र जिसे स्थानीय स्तर पर “कश्मीरें” नामक जाती से जाना जा रहा है, जो खुद को आदिवासी होने का दावा करती हैं, उसने कथित रूप से अपना फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी कार्यालयों और अन्य लोगों को दस्तावेजों के आधार पर फर्जी तरीके से आदिवासी मंडला जिले में उसने द्वारा आदिवासियों के साथ में घिनौना खेल खेला जा रहा है।

अपनी फर्जी जाति की पहचान का उपयोग करते हुए छाया कश्मीरें ने न केवल प्रशासनिक लाभ हासिल करने की जुगत पर बेठी हुई है बल्कि जमीन की खरीद-फरोख्त और कॉलोनाइजर जैसी गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

दैनिक रेवांचल टाइम्स के द्वारा जब छाया कश्मीरें की जाती प्रमाण पत्र के सम्बन्ध में जानकारी जुटाई गई और अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय परासिया से जाती प्रमाण पत्र के सम्बन्ध में जानकारी ली गई तो संबंधित अनुविभागीय कार्यालय परासिया द्वारा लिखित में बतलाया गया कि हमारे इस कार्यालय से छाया कश्मीरें नाम की महिला का ऐसा कोई भी जाति प्रमाण जारी नहीं किया गया हैं। तो फिर सवाल यह उठता है कि जिस जाति प्रमाण पत्र के आधार पर छाया कश्मीरें नाम की महिला जो मंडला के ग्राम पंचायत बिनेका में विवाह उपरांत आई हैं और मंडला जिले में आदिवासियों की जमीन की खीरद फरोख्त कर रही हैं।

वह विवाह से पूर्व छिंदवाड़ा जिले के परासिया तहसील में निवासरत थी, विवाह उपरांत जब उक्त महिला की शादी मंडला जिले के एक पिछड़ा वर्ग परिवार के अंतर्गत में शादी होकर आई तो फिर इस छाया कश्मीरें नाम की महिला का जाति प्रमाण पत्र आखिर कैसे आदिवासी का प्रमाणपत्र मान्य होगा जबकी छिंदवाड़ा के परसिया से कोई प्रमाण पत्र अनुविभागीय कार्यालय से जारी ही नही किया गया तो इनका प्रमाणपत्र कब और कैसे बन गया किसने बनवाया यह एक जांच का विषय हैं।
वही स्थानीय लोगों का कहना है कि उक्त महिला लंबे समय से खुद को आदिवासी जाति का बताकर सरकारी योजनाओं से संबंधित अन्य लाभ लेने की जुगत में है, जबकि उसके मूल दस्तावेजों और पृष्ठभूमि पर संदेह बना हुआ है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि इस पूरे मामले में कुछ अधिकारियों और मंडला के स्थानीय नेताओं की भूमिका भी संदिग्ध हो सकती है, जिनकी मिलीभगत के बिना इस तरह की गतिविधियां संभव नहीं हैं।

मंडला में आदिवासी नेताओं की नाक के नीचे “गैर आदिवासी महिला” आदिवासियों का कर रही हैं शोषण

मंडला जिले के आदिवासीयों और आमजनता का यह भोलापन कहें या कानून और जानकारी का अभाव जिसके चलते मंडला के आदिवासी नेता जो बड़े चेहरे के रूप में जाने और पहचाने जाते हैं उन्हीं के नाक के नीचे गैर आदिवासी महिला के द्वारा आदिवासियों का शोषण किया जा रहा हैं, और जिम्मेदार नेता हो या मंडला के अधिकारी यह सब उनकी नाक के नीचे हो रह हैं।

जल्द ही दैनिक रेवांचल टाइम्स उच्च न्यायालय से करेगा जांच की मांग

ग्रामीणों की मांग और उक्त महिला के जाति प्रमाण पत्र की जांच को लेकर मामले की निष्पक्ष जांच के लिए माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर से जांच करवाने की मांग को लेकर शरण लेगा जिससे कि आने वाले समय पर मंडला जिले के आदिवासीयों के होने वाले शोषण पर रोक लगे और छाया कश्मीरें के ऊपर सख्त कार्यवाही हो । यदि जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाया जाता है, तो संबंधित महिला के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और अब तक लिए गए लाभों की भी समीक्षा की जाए।

दैनिक रेवांचल टाइम्स के द्वारा उक्त मामले को लेकर जिला स्तरीय जांच समिति द्वारा प्रमाण पत्रों की सत्यता की जांच की भी मांग की जायेगी। यदि प्रमाण पत्र गलत पाया जाता है, तो उसे निरस्त कर कानूनी कार्रवाई की जाये।

“पहचान भी अब ‘ऑन डिमांड’?”

मंडला में इन दिनों पहचान भी शायद “ऑन डिमांड सर्विस” बन चुकी है।
जिसे जो बनना है, बस एक फर्जी कागज का जुगाड़ करो और बन जाओ — आदिवासी, कॉलोनाइजर या फिर योजनाओं के स्थायी लाभार्थी!

प्रशासन की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं —

रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिका भी इसमें संदिग्ध नजर आती हैं क्योंकि जब एक आदिवासी जिले में मंडला के आदिवासी से दूसरे जिले की आदिवासी महिला के द्वारा जमीन की खरीद फरोख्त की जा रही थी तो फिर रजिस्ट्री के समय पर रजिस्ट्रार कार्यालय के द्वारा छाया कश्मीरें की जाती की जांच क्यों नहीं की गई या करवाई गई। जैसे सब कुछ सामने होते हुए भी “हमें तो कुछ दिखा ही नहीं” का नया रिकॉर्ड बनाने में जुटे हैं।

लगता है अब सरकारी योजनाओं के साथ एक नया ऑफर भी जोड़ देना चाहिए —
“फर्जी प्रमाण पत्र बनवाएं, और बिना रोक-टोक लाभ उठाएं!”

यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि सामाजिक न्याय के साथ खिलवाड़ का भी उदाहरण है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रवृत्ति मंडला जिले के अन्य क्षेत्रों में भी फैल सकती है।

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