प्रशासनिक अधिकारी की बेटी ने बदली तकदीर जैविक खेती और पशुपालन से हर माह ₹2 लाख की कमाई

Revanchal
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छिंदवाड़ा की सुषमा शर्मा बनीं महिला सशक्तिकरण की मिसाल, ‘फार्मर ऑफ द ईयर’ से भी हो चुकी हैं सम्मानित

रेवांचल टाइम्स ​छिंदवाड़ा

संकल्प और समर्पण जब मिट्टी से जुड़ता है, तो सफलता की नई इबारत लिखता है। इसे सच कर दिखाया है छिंदवाड़ा जिले के परासिया विकासखंड स्थित जाटाछापर की प्रगतिशील महिला कृषक श्रीमती सुषमा शर्मा ने। एक प्रशासनिक अधिकारी की पुत्री होने के नाते सुविधाओं वाला जीवन उनके पास था, लेकिन उन्होंने खेतों की मेड़ों और जैविक खाद के केंचुआ टांकों के बीच अपना भविष्य तलाशा। आज सुषमा शर्मा न केवल लाखों की आय अर्जित कर रही हैं, बल्कि सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का प्रकाश स्तंभ बन गई हैं।

​एक पशु से 45 पशुओं का सफर2000 रुपये प्रति लीटर बिकता है घी
​सुषमा शर्मा की यह यात्रा वर्ष 2000 में शुरू हुई थी। शुरुआती दौर में उन्होंने मात्र एक पशु से काम शुरू किया और कृषि विभाग के प्रशिक्षण के बाद वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) बनाना सीखा। आज उनके पास 45 से अधिक देशी और क्रॉस नस्ल के पशु हैं। उनके फार्म के गिर गाय के घी की शुद्धता की चर्चा पूरे प्रदेश में है। आलम यह है कि जिले के प्रभारी मंत्री से लेकर कलेक्टर तक उनके उत्पादों के मुरीद हैं और अग्रिम बुकिंग कराते हैं।

​जर्मनी और इटली से सीखी आधुनिक तकनीक
​सुषमा शर्मा ने अपनी सफलता को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रखा। वर्ष 2014 में मुख्यमंत्री अध्ययन भ्रमण के तहत उन्होंने जर्मनी और इटली की 12 दिवसीय यात्रा की। वहां से प्राप्त आधुनिक पशुपालन और वैज्ञानिक खेती के अनुभवों को उन्होंने अपनी 2.5 एकड़ की जमीन पर उतारा। आज उनके खेत में उगी जैविक सब्जियां, दालें और अनाज सीधे ग्राहकों तक पहुंचते हैं, जिससे उन्हें प्रति माह लगभग 2 लाख रुपये की शुद्ध आय हो रही है।

​उपलब्धियां जो बढ़ाती हैं जिले का मान
​उनकी उत्कृष्ट कार्यप्रणाली के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है,
​2006: इंटरनेशनल अवार्ड (नई दिल्ली)।
​2011: सर्वोत्तम किसान पुरस्कार (आत्मा, छिंदवाड़ा)।
​2025: ‘फार्मर ऑफ द ईयर’ (पूसा, नई दिल्ली)।


​सैकड़ों महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
​आत्मा योजना के माध्यम से उन्होंने गाँव-गाँव जाकर महिलाओं के समूह गठित किए और उन्हें पारंपरिक खेती से हटकर जैविक खेती की ओर प्रेरित किया। कृषक कल्याण वर्ष 2026 के अवसर पर सुषमा शर्मा की यह कहानी संदेश देती है कि आधुनिक तकनीक और जैविक पद्धति का तालमेल खेती को लाभ का धंधा बना सकता है।
​सुषमा की यात्रा केवल खेती की नहीं, बल्कि साहस और आत्मविश्वास की कहानी है। उन्होंने साबित कर दिया कि खेती केवल जीवन यापन का साधन नहीं, बल्कि एक गौरवशाली करियर भी हो सकता है।

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