कार्रवाई सड़क पर, कारोबार गली-कूचों में…!
दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/तहसील मुख्यालय घुघरी इन दिनों किसी छोटे कस्बे से ज्यादा “खुली अर्थव्यवस्था” का उदाहरण बनता जा रहा है। यहां गली-कूचों में शराब और सूखे नशे का कारोबार ऐसे फल-फूल रहा है मानो प्रशासन ने “आत्मनिर्भर नशा योजना” लागू कर दी हो।
कहने को तो पुलिस का नारा “देश भक्ति, जन सेवा” है, लेकिन घुघरी में जनता पूछ रही है कि घुघरी पुलिस के द्वारा जन सेवा आखिर किसकी की जा रही है…? आम नागरिक की या अवैध कारोबारियों की…?
तीन वर्षों में चोरी, विवाद और अन्य वारदातों की लंबी सूची तैयार हो गई, लेकिन परिणामों की फाइल शायद अब भी किसी कमरे पर धूल भरे रैक में आराम कर रही है। हां, यदि कोई ऑटो चालक दो सवारी ज्यादा बैठा ले या किसी बाइक चालक का हेलमेट थोड़ा तिरछा दिख जाए, तो कार्रवाई इतनी तेज होती है मानो पुलिस विभाग ने वही “राष्ट्रीय सुरक्षा अभियान” घोषित कर दिया हो।
साप्ताहिक बाजार में ओवरलोड वाहन खुलेआम दौड़ते हैं,
घुघरी थाने के अंतर्गत आने वाले लगभग ज्यादातर गांव-गांव में कच्ची शराब बिकती है, सूखे नशे का जाल युवाओं तक पहुंच रहा है, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि पुलिस का मुखबिर तंत्र शायद इन दिनों “लापता” चल रहा है। जनता अब मजाक में कहने लगी है कि घुघरी के मुखबिरों को खोजने के लिए भी अलग से मुखबिर लगाना पड़ेगा और एक सघन सर्च अभियान चलाना पड़ेगा।
हालात ऐसे हैं कि कार्रवाई वहां दिखाई देती है जहां चालान से तत्काल वसूली संभव हो, लेकिन जहां अवैध कारोबार पर बड़ी कार्रवाई की जरूरत है, वहां घुघरी थाना प्रभारी और पुलिस के अन्य कर्मचारियों के बीच में खामोशी का सन्नाटा पसरा हुआ है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या घुघरी में कानून केवल वाहन चालकों के लिए बचा है…?
तबअवैध शराब और नशे का कारोबार करने वालों पर भी पुलिस की नजर में “सामाजिक परंपरा” बन चुका है…?
या फिर यह सब देखकर भी अनदेखा करने की नई प्रशासनिक कार्यप्रणाली है…?
जनता चाहती है कि पुलिस केवल चालान की मशीन बनकर न रह जाए, बल्कि युवाओं को नशे की गिरफ्त से बचाने के लिए भी सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई करे। वरना आने वाले समय में घुघरी की पहचान तहसील मुख्यालय से ज्यादा “नशे के खुले बाजार” के रूप में होने लगेगी।
