फर्जी जाति प्रमाण पत्र का खेल और प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी!

Revanchal
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मंडला में आदिवासियों के हक पर डाका, नेता और अफसर आखिर कब जागेंगे?

दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला/आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा में है जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक संरक्षण और आदिवासी हितों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक गैर आदिवासी महिला कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे स्वयं को आदिवासी बताकर न केवल जमीनों की खरीद-फरोख्त कर रही है, बल्कि कॉलोनाइजर गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इतने लंबे समय तक यह सब जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं की जानकारी के बिना कैसे चलता रहा?

मामले में छाया कश्मीरें नामक महिला पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह मूल रूप से पिछड़ा वर्ग परिवार से संबंध रखने के बावजूद आदिवासी पहचान का लाभ लेकर जिले में जमीनों के सौदों में सक्रिय है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल दस्तावेजी फर्जीवाड़ा नहीं बल्कि आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों और अस्तित्व पर सीधा हमला माना जाएगा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि संबंधित कार्यालय से जाति प्रमाण पत्र की जानकारी मांगे जाने पर कथित रूप से जवाब मिला कि ऐसा कोई प्रमाण पत्र जारी ही नहीं किया गया। ऐसे में कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं—

आखिर वह प्रमाण पत्र आया कहां से?
किसने तैयार किया?
किस अधिकारी ने सत्यापन किया?
और इतने बड़े स्तर पर कथित फर्जीवाड़े के बावजूद जिला प्रशासन अब तक मौन क्यों है?

नेताओं की चुप्पी भी सवालों के घेरे में

आदिवासी हितों की राजनीति करने वाले जिले के जनप्रतिनिधियों और नेताओं की खामोशी भी अब सवालों के घेरे में है। चुनाव के समय आदिवासी अधिकारों और सम्मान की बात करने वाले नेता आखिर इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? क्या आदिवासी समाज केवल भाषणों और मंचों तक सीमित होकर रह गया है?

यदि कोई गरीब आदिवासी परिवार छोटी सी प्रशासनिक त्रुटि कर दे तो तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन करोड़ों की जमीनों और कथित फर्जी पहचान के इस पूरे मामले पर जिम्मेदारों की चुप्पी आखिर किस ओर संकेत करती है?

भोले-भाले आदिवासियों के अधिकारों पर कब्जा?

ग्रामीणों का आरोप है कि जिले में बाहरी और गैर आदिवासी तत्व कथित फर्जी दस्तावेजों के सहारे आदिवासियों के अधिकारों पर कब्जा जमा रहे हैं। कानून और प्रक्रियाओं की जानकारी के अभाव में गरीब आदिवासी परिवारों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। जमीनें हाथ से निकल रही हैं और जिम्मेदार विभाग केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं।

रजिस्ट्रार कार्यालय और प्रशासन पर भी सवाल

जमीन रजिस्ट्री के दौरान दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हुआ?
क्या जातिगत पात्रता की जांच की गई थी?
यदि नहीं हुई, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि बिना राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के इतने लंबे समय तक ऐसा कथित खेल चल पाना संभव नहीं है।

कब तक चलता रहेगा आदिवासियों का शोषण?

आदिवासी बहुल जिले मंडला में यदि गैर आदिवासी लोग कथित फर्जी प्रमाण पत्रों के सहारे आदिवासी बनकर लाभ लेते रहेंगे, तो वास्तविक हकदारों का भविष्य क्या होगा? आखिर कब तक गरीब आदिवासियों के अधिकारों का सौदा होता रहेगा? और कब तक जिम्मेदार अधिकारी और नेता “हमें जानकारी नहीं” का मुखौटा पहनकर बैठे रहेंगे?

अब जरूरत केवल बयानबाजी की नहीं, बल्कि निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर रोक नहीं लगी, तो आने वाले समय में आदिवासी समाज का भरोसा प्रशासन और व्यवस्था दोनों से पूरी तरह उठ सकता है।

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