मंडला में आरटीआई कानून बना तमाशा, सचिव जी निकले लोकतंत्र के “सुपरमैन”

Revanchal
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छः पेशियां, 181 पर शिकायतें और आदेशों का ढेर… फिर भी जानकारी गायब!

दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला/ मंडला जिले में इन दिनों एक नया प्रशासनिक “चमत्कार” देखने को मिल रहा है। यहां कानून किताबों में चलता है और जमीनी हकीकत में सचिव महोदय की मर्जी। ऐसा लगने लगा है जैसे पंचायत सचिव अब केवल पंचायत नहीं चला रहे, बल्कि संविधान और आरटीआई कानून की “री-राइटिंग” भी कर रहे हैं।


ऐसा हम नहीं बल्कि नैनपुर जनपद के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बोरी पीपरडाही के सचिव महोदय कह रहे हैं।

देश में वर्ष 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार कानून यानी आरटीआई इसलिए बनाया गया था ताकि जनता सरकारी कामकाज में पारदर्शिता देख सके, भ्रष्टाचार उजागर हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। लेकिन मंडला जिले की ग्राम पंचायत बोरी पीपरदडाही में यह कानून शायद फाइलों के नीचे दबकर दम तोड़ चुका है।


ग्राम पंचायत निवासी पंकज जांघेला ने पंचायत में वर्ष 2023 से 2025 तक हुए भुगतान, कैशबुक और बिल वाउचर की प्रमाणित प्रतियां मांगते हुए आरटीआई आवेदन लगाया। अब आम आदमी को लगा होगा कि कानून है, जानकारी मिल जाएगी। लेकिन शायद आवदेनकर्ता यह भूल गया कि यह “सामान्य पंचायत” नहीं बल्कि “सुपर सचिव” वाली पंचायत है।

समय सीमा निकल गई, जानकारी नहीं मिली। अपील हुई। जनपद पंचायत नैनपुर के अपीलीय अधिकारी ने एक नहीं, दो नहीं बल्कि लगातार छः पेशियां लगाईं। लेकिन सचिव महोदय की प्रशासनिक ताकत ऐसी कि वे एक भी पेशी में उपस्थित नहीं हुए। शायद उन्हें लगा होगा कि अधिकारी तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन “सचिव सत्ता” अमर है।

आखिरकार आदेश पारित हुए कि संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। मगर आदेश भी शायद पंचायत भवन के बाहर ही दम तोड़ गए। आज दिनांक तक न जानकारी मिली, न जवाब मिला और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी की सख्ती दिखाई दी।

छः पेशियां, 181 पर शिकायतें और आदेशों का ढेर… फिर भी जानकारी गायब!

थक हारकर शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 में शिकायत की। मगर वहां भी वही हाल। शिकायतें घूमती रहीं, समाधान सोता रहा और सचिव महोदय अपनी “अजेय छवि” में मगन रहे।

अब सवाल यह उठता है कि हर सोमवार को होने वाली टाइम लिमिट बैठकें आखिर किसके लिए होती हैं? क्या वहां सिर्फ चाय, बिस्किट और आंकड़ों की खानापूर्ति होती है? हर मंगलवार की जनसुनवाई क्या केवल फोटो खिंचवाने और भाषण देने तक सीमित रह गई है?

अगर एक पंचायत सचिव लगातार आदेशों को नजरअंदाज कर सकता है, पेशियों में नहीं पहुंचता, आरटीआई कानून को ठेंगा दिखाता है और 181 शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो फिर जनता किस पर भरोसा करे?

मंडला जिले की जनता अब यह पूछ रही है कि आखिर बोरी पीपरडाही के सचिव महोदय किस “अदृश्य शक्ति” के संरक्षण में हैं? क्या उन्हें कानून का डर नहीं, या फिर जिले का प्रशासन ही उनके सामने बेबस हो चुका है? या फिर प्रशासनिक तंत्र ही उनको संरक्षण दिए हुए हैं, जिसके चलते सचिव महोदय खुद को कानून से ऊपर समझ बैठे हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि अब जिले में नया संविधान लागू हो चुका है —
“जो सचिव बोले वही कानून।”

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