अपराधी छवि वाले भी कुर्सी पर आसीन हो जाते हैं—लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है?

Revanchal
9 Min Read

लेखक — चंद्रकांत सी पूजारी गुजरात

दैनिक रेवांचल टाईम्स – लोकतंत्र को जनता की सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जहाँ शासन जनता के द्वारा, जनता के लिए और जनता का होता है। किंतु जब यही लोकतंत्र अपराधी छवि वाले व्यक्तियों को सत्ता की कुर्सी तक पहुँचा देता है, तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना बन जाती है। ऐसे हालात केवल कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाते, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों को भी गहराई से प्रभावित करते हैं।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि “अपराधी छवि” से आशय क्या है। ऐसे लोग, जिन पर हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, लूट, धमकी या अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगे हों—और कई मामलों में आरोप सिद्ध भी हुए हों—वे जब चुनाव लड़ते हैं और जीतकर जनप्रतिनिधि बनते हैं, तो लोकतंत्र की आत्मा को आघात पहुँचता है। यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के कई लोकतांत्रिक देशों में भी देखने को मिलती है, जहाँ धनबल, बाहुबल और प्रभाव का उपयोग कर चुनाव जीते जाते हैं।

भारत के संदर्भ में देखें तो कई बार चुनावों में ऐसे उम्मीदवार सामने आते हैं, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं। फिर भी वे भारी मतों से जीत जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण मतदाताओं की विवशता, जातीय और सामुदायिक समीकरण तथा राजनीतिक दलों की स्वार्थपूर्ण नीतियाँ हैं। राजनीतिक दल अक्सर “जीतने वाले उम्मीदवार” को प्राथमिकता देते हैं, भले ही उसकी छवि कितनी ही संदिग्ध क्यों न हो। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

उदाहरण के तौर पर कई राज्यों में ऐसे जनप्रतिनिधि रहे हैं, जिन पर हत्या, अवैध वसूली, भ्रष्टाचार और धमकी जैसे गंभीर आरोप लंबित रहे, फिर भी वे मंत्री पद तक पहुँच गए। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि चुनाव जीतने के बाद आरोपी व्यक्तियों का प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि गवाह डर जाते हैं और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने लगती है। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है, जब न्यायिक प्रक्रिया धीमी हो और वर्षों तक मामले लंबित पड़े रहें। इस बीच आरोपी व्यक्ति सत्ता का उपयोग अपने प्रभाव को बढ़ाने और कानून को प्रभावित करने में कर सकता है।

एक उदाहरण बिहार के चर्चित बाहुबली नेताओं की राजनीति से लिया जा सकता है। वर्षों तक कई ऐसे नेता चुनाव जीतते रहे, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। बावजूद इसके, वे अपने क्षेत्र में “मजबूत नेता” की छवि बनाकर जनता का समर्थन प्राप्त करते रहे। कुछ लोगों का मानना था कि वे प्रशासन से अधिक तेजी से काम करवाते हैं और स्थानीय समस्याओं का समाधान करते हैं। यह सोच लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि इससे कानून से अधिक व्यक्ति-विशेष की शक्ति को महत्व मिलने लगता है। जब जनता कानून और व्यवस्था की जगह किसी दबंग व्यक्ति पर भरोसा करने लगे, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है।

यह प्रश्न उठता है कि आखिर जनता ऐसे उम्मीदवारों को चुनती क्यों है? इसका उत्तर कई स्तरों पर मिलता है।

पहला, कई क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था कमजोर होती है और लोग “ताकतवर” व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनाना चाहते हैं, ताकि वह उनके हितों की रक्षा कर सके।

दूसरा, जाति और धर्म के आधार पर मतदान की प्रवृत्ति आज भी प्रबल है, जिससे योग्य और ईमानदार उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं।

तीसरा, गरीब और अशिक्षित मतदाता कई बार लालच, डर या दबाव में आकर मतदान करते हैं। चुनावों में धनबल का खुलकर उपयोग किया जाता है। कहीं शराब बाँटी जाती है, कहीं नकद धन दिया जाता है और कहीं झूठे वादों के माध्यम से मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है।

चौथा, समाज में राजनीतिक जागरूकता की कमी भी एक बड़ा कारण है। बहुत से मतदाता उम्मीदवार के चरित्र और कार्यों की बजाय केवल पार्टी, जाति या व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देते हैं। परिणामस्वरूप अपराधी छवि वाले लोग लोकतंत्र की सीढ़ियाँ चढ़ जाते हैं।

इस स्थिति के दुष्परिणाम अत्यंत गंभीर हैं। सबसे पहले, इससे शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ता है। जब स्वयं कानून बनाने वाले ही कानून का उल्लंघन करते हों, तो आम जनता में कानून के प्रति सम्मान कम हो जाता है। दूसरा, इससे प्रशासनिक तंत्र पर दबाव पड़ता है और निष्पक्ष कार्य करना कठिन हो जाता है। तीसरा, समाज में गलत संदेश जाता है कि शक्ति और प्रभाव के बल पर सब कुछ हासिल किया जा सकता है, चाहे नैतिकता का हनन ही क्यों न करना पड़े।

इसके अतिरिक्त, यह लोकतंत्र में जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है। जब लोग देखते हैं कि अपराधी प्रवृत्ति के लोग सत्ता में हैं, तो उनका लोकतांत्रिक प्रक्रिया से मोहभंग होने लगता है। युवाओं के मन में राजनीति के प्रति नकारात्मक धारणा बनती है। ईमानदार और शिक्षित लोग राजनीति में आने से कतराने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि स्वच्छ छवि के साथ चुनाव जीतना कठिन है। यह स्थिति दीर्घकाल में लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि इससे जनभागीदारी और विश्वास दोनों कम होते जाते हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए कई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

पहला, न्यायिक प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाना होगा, ताकि आपराधिक मामलों का शीघ्र निपटारा हो सके। वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने से अपराधियों को राजनीतिक लाभ मिलता है।

दूसरा, चुनाव आयोग को ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिनके तहत गंभीर आरोपों वाले व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके।

तीसरा, राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट देना होगा। यदि राजनीतिक दल केवल जीत को ही सर्वोपरि मानते रहेंगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता निरंतर गिरती जाएगी।

चौथा, सबसे महत्वपूर्ण है मतदाताओं की जागरूकता। जब तक जनता स्वयं ईमानदार और योग्य उम्मीदवारों को नहीं चुनेगी, तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

शिक्षा और जागरूकता इस दिशा में सबसे प्रभावी हथियार हैं। यदि मतदाता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग हो जाएँ, तो वे किसी भी प्रकार के दबाव या लालच में आए बिना सही निर्णय ले सकते हैं। मीडिया और सामाजिक संगठनों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है, जो जनता को सही जानकारी और उचित दृष्टिकोण प्रदान कर सकते हैं। समाचार माध्यमों को केवल सनसनी फैलाने के बजाय जनता को तथ्यात्मक जानकारी देकर जागरूक बनाना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया जाए, न कि शक्ति और भय का प्रतीक। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग पहुँचेंगे, जिनकी पहचान ईमानदारी, सेवा और नैतिकता से होगी। यदि अपराधी प्रवृत्ति के लोगों का राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों का लोकतंत्र से विश्वास उठ सकता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि अपराधी छवि वाले व्यक्तियों का सत्ता में आना लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है। यह केवल राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संकट भी है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं।

इसलिए आवश्यक है कि सरकार, न्यायपालिका, राजनीतिक दल और सबसे बढ़कर जनता—सभी मिलकर इस समस्या का समाधान खोजें। तभी हम एक सशक्त, स्वच्छ और आदर्श लोकतंत्र की कल्पना को साकार कर सकते हैं, जहाँ सत्ता का अधिकार केवल योग्य, ईमानदार और जनसेवा के प्रति समर्पित लोगों को मिले, न कि अपराधियों को।

👁️ 24 views Views
Share This Article
Translate »