पश्चिम वनमण्डल मण्डला में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप-करोड़ों की खरीदी, जांच में देरी और जंगलों की बर्बादी पर उठे बड़े सवाल

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाइम्स | मण्डला
मण्डला जिले का पश्चिम वनमण्डल इन दिनों गंभीर भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। वन संपदा की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला विभाग अब खुद आरोपों के जंगल में उलझता दिखाई दे रहा है। करोड़ों रुपये के कथित घोटाले, जांच में देरी, अवैध वसूली, जंगलों की कटाई और वनभूमि पर बढ़ते अतिक्रमण ने विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।


सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार तत्कालीन वनमण्डलाधिकारी निध्यानंथम एल एवं सहायक ग्रेड-3 स्वेतांक चौरसिया के खिलाफ सितंबर 2025 में माननीय राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री को शिकायत भेजी गई थी। शिकायत में करोड़ों रुपये की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, लेकिन नौ माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मामले में कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। इससे विभागीय जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।


तेंदूपत्ता संघ में करोड़ों की खरीदी पर सवाल
सूत्रों का आरोप है कि पश्चिम वनमण्डल अंतर्गत तेंदूपत्ता संघ में सामग्री खरीदी के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियमों का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि बिना टेंडर प्रक्रिया अपनाए मनमाने तरीके से “टेड्रेस”, “यादव टेड्रेस” सहित अन्य फर्मों को वर्ष 2023 में करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया।


बताया जा रहा है कि पूरी प्रक्रिया में भारी कमीशनखोरी हुई और नियमों को ताक पर रखकर पसंदीदा फर्मों को लाभ पहुंचाया गया। यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं।


जांच को दबाने की कोशिश?
जानकारी के अनुसार प्रारंभिक जांच भोपाल स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कराए जाने का प्रस्ताव था, लेकिन आरोप है कि तत्कालीन डीएफओ ने मंत्रालय स्तर पर संपर्क कर जांच को वापस मण्डला स्थानांतरित करा लिया।
सूत्रों का दावा है कि ऐसा शिकायत में शामिल कर्मचारियों को बचाने और पूरे मामले को दबाने के उद्देश्य से किया गया। यही कारण है कि महीनों बीतने के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ सकी और मामला फाइलों में दबकर रह गया।


जांच के घेरे में कर्मचारी, फिर भी महत्वपूर्ण शाखाओं का प्रभार
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि विभागीय जांच के बावजूद सहायक ग्रेड-3 स्वेतांक चौरसिया को उसी वनमण्डल में बनाए रखा गया है। इतना ही नहीं, उन्हें कई महत्वपूर्ण शाखाओं का प्रभार भी सौंपा गया है।
जबकि शासकीय नियमों के अनुसार जांचाधीन कर्मचारी को संवेदनशील शाखाओं से अलग रखा जाना चाहिए, ताकि जांच प्रभावित न हो। आरोप है कि दस्तावेजों में हेराफेरी और साक्ष्यों को प्रभावित करने की आशंका के बावजूद विभाग आंख मूंदे बैठा है।


अवैध वसूली और पोस्टिंग के खेल के आरोप
सूत्रों के अनुसार वर्तमान जांच अधिकारी एसडीओ श्रीराम सूत्रकार पर भी पक्षपात और कथित वसूली के गंभीर आरोप लग रहे हैं। आरोप है कि स्थानांतरित वनरक्षकों से राशि लेकर उन्हें समय पर रिलिव नहीं किया गया। वहीं बीट निरीक्षण और पदस्थापना के नाम पर भी कथित रूप से अवैध वसूली का खेल चलता रहा।


बताया जा रहा है कि पूर्व में भी डिप्टी रेंजर्स द्वारा स्वेतांक चौरसिया के खिलाफ पोस्टिंग के नाम पर वसूली की शिकायत की गई थी, जिसके बाद उन्हें स्थापना शाखा से हटाया गया था। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दोबारा उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंप दी गईं, जिससे कर्मचारियों में भारी नाराजगी व्याप्त है।


जंगल कट रहे, वनभूमि पर कब्जे बढ़ रहे
एक ओर विभागीय भ्रष्टाचार के आरोप हैं, तो दूसरी ओर जंगलों की सुरक्षा भी सवालों के घेरे में है। जिले में लगातार पुराने पेड़ों की कटाई हो रही है, वनभूमि पर अवैध कब्जे बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर केवल खानापूर्ति करते नजर आ रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में वन माफियाओं के हौसले बुलंद बताए जा रहे हैं। आरोप है कि बिना विभागीय संरक्षण के इतने बड़े स्तर पर अवैध कटाई और कब्जे संभव नहीं हो सकते। यही कारण है कि अब वन विभाग के आला अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।


नए डीएफओ की भूमिका पर भी सवाल
वर्तमान में पदस्थ नए वनमण्डलाधिकारी की कार्यशैली को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों का कहना है कि पूरे मामले की जानकारी होने के बावजूद अब तक न तो निष्पक्ष जांच कराई गई और न ही किसी दोषी पर कार्रवाई हुई।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विभाग वास्तव में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच करेगा या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह लंबे समय तक ठंडे बस्ते में दबा रहेगा।


वही जानकारी के अनुसार जंगलों की सुरक्षा, वन संपदा का संरक्षण और सरकारी धन की पारदर्शिता सुनिश्चित करना वन विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन यदि विभाग के भीतर ही भ्रष्टाचार और संरक्षण का खेल चलता रहा, तो आने वाले समय में इसका खामियाजा केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि आम जनता को भी ही भुगतना पड़ रहा हैं।

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