ईद-उल-अज़हा पर नायब मुफ़्ती-ए-आज़म का पैगाम
जबलपुर:
शहर में गुरुवार की सुबह सिर्फ एक मजहबी रस्म का मंज़र नहीं थी। फिज़ाओं में तकबीरों की गूंज थी, सफेद कुर्तों में सजे लोग थे, ईदगाहों की तरफ बढ़ते कदम थे और हर चेहरे पर एक अलग सी रौनक थी। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल भी हवा में तैर रहा था क्या कुर्बानी सिर्फ जानवर की होती है, या इंसान अपने अंदर बैठे दिखावे, घमंड और लालच की भी कुर्बानी देता है?
ईद-उल-अज़हा के मुबारक मौके पर शहर की तमाम मस्जिदों और ईदगाहों में हजारों मुस्लिम भाइयों ने नमाज़ अदा की। हर तरफ अमन, मोहब्बत और भाईचारे का माहौल दिखाई दिया। पुलिस और प्रशासन भी पूरी मुस्तैदी के साथ मौजूद रहा। मगर इस पूरे मंज़र में सबसे ज्यादा चर्चा ईदगाह कलां रानीताल में हुई उस तकरीर की रही, जहाँ नायब मुफ़्ती-ए-आज़म मध्यप्रदेश हज़रत मौलाना सूफ़ी ज़ियाउलहक़ क़ादरी ने बड़ी सादगी लेकिन गहरी बात कही।
उन्होंने फरमाया कुर्बानी दिखावे के लिए नहीं, सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए होनी चाहिए।
यह सिर्फ एक जुमला नहीं था, बल्कि आज के दौर पर सीधा सवाल था। ऐसा दौर जहाँ हर नेक काम कैमरे के सामने किया जाने लगा है। जहाँ इबादत भी सोशल मीडिया की पोस्ट बनती जा रही है। मौलाना साहब ने साफ लफ्ज़ों में कहा कि अगर कोई शख्स सिर्फ गोश्त हासिल करने या लोगों को दिखाने की नीयत से कुर्बानी करता है, तो ऐसी कुर्बानी अल्लाह की बारगाह में कबूल नहीं होगी।
उन्होंने कुरआन शरीफ का हवाला देते हुए कहा अल्लाह तक न उनका गोश्त पहुँचता है, न खून उससे सिर्फ तुम्हारा तक़वा पहुँचता है। और शायद यही ईद-उल-अज़हा का असली पैगाम भी है।
मौलाना सूफ़ी ज़ियाउल हक़ क़ादरी बुरहानी ने लोगों से यह भी गुजारिश की कि कुर्बानी के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट न करें। उन्होंने कहा कि यह अमल रिया यानी दिखावे से बचने के लिए जरूरी है। दीन की खूबसूरती सादगी में है, नुमाइश में नहीं।
तकरीर के बाद ईद-उल-अज़हा की नमाज़ अदा की गई। अल्लाह-हू-अकबर की सदाओं के बीच हजारों सिर सजदे में झुक गए। वह मंज़र सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं, बल्कि इंसानी बराबरी और बंदगी की तस्वीर लग रहा था। इस मौके पर इमाम अहले सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां के नवासे भी नमाज़ में शरीक हुए।
नमाज़ के बाद मुफ्ती-ए-आज़म मध्यप्रदेश हज़रत मौलाना डॉक्टर मुशाहिद रज़ा कादरी ने मुल्क में अमन, तरक्की और खुशहाली की खास दुआ की। साथ ही उन्होंने त्योहार को पुरअमन तरीके से सम्पन्न कराने में सहयोग देने वाले प्रशासन, पुलिस और मीडिया का शुक्रिया अदा किया।
शहर की दूसरी ईदगाहों में भी बड़ी तादाद में लोगों ने नमाज़ अदा की। मोमिन ईदगाह गोहलपुर में हाफ़िज़ मुहम्मद ताहिर साहब की इमामत में नमाज़ हुई, जहाँ नमाज़ियों की भीड़ सड़क तक फैल गई। सदर बाजार ईदगाह में मौलाना सुल्तान अहमद साहब ने नमाज़ पढ़ाई, जिसमें सेना और सुरक्षा संस्थानों में काम करने वाले मुस्लिम अफसर और कर्मचारी भी शामिल हुए।
गढ़ा ईदगाह में हाफिज काज़ी अमीर अशरफ़ हुसैनी मियां की इमामत में नमाज़ अदा की गई, जहाँ मेडिकल कॉलेज के छात्र और कर्मचारी भी बड़ी तादाद में पहुंचे।
आगा मोहम्मद साहब की दरगाह और शिया जामा मस्जिद फूटाताल में भी अकीदत के साथ नमाज़ अदा की गई। हर जगह एक ही दुआ थी मुल्क में अमन रहे, मोहब्बत बनी रहे और इंसानियत सलामत रहे।
ईद-उल-अज़हा सिर्फ कुर्बानी का त्योहार नहीं, बल्कि अपने नफ़्स पर काबू पाने का पैगाम भी है। सुन्नत-ए-इब्राहीमी हमें यह याद दिलाती है कि सबसे बड़ी कुर्बानी वह होती है, जब इंसान अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी अल्लाह की राह में कुर्बान करने का जज़्बा रखे।
दिनभर शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में रौनक बनी रही। बच्चों के चेहरों पर खुशी थी, घरों में दावतों का दौर था और लोग एक-दूसरे के गले मिलकर ईद की मुबारकबाद दे रहे थे। लेकिन इस बार की ईद सिर्फ खुशियों का त्योहार नहीं लगी यह जैसे एक पैगाम देकर गई कि इबादत की असली रूह सच्चाई, सादगी और खालिस नीयत में होती है।
मुहम्मद अनवार बाबू
