पंचायती राज व्यवस्था ध्वस्त: सचिवों की मनमानी से ग्रामीण बेहाल, जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे सवाल

Revanchal
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मुख्यालय से गायब सचिव, विकास कार्य ठप

आखिर किसके संरक्षण में चल रही लापरवाही?

दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
मंडला जिले में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतरती नजर आ रही है। ग्राम पंचायतों में नियुक्त सचिव और जनप्रतिनिधियों की मनमानी के चलते ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाओं और शासकीय योजनाओं का लाभ पाने के लिए भटकना पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन सचिवों को पंचायत मुख्यालय में रहकर जनता की समस्याओं का समाधान करना चाहिए, वे महीनों तक मुख्यालय से गायब रहते हैं और विभागीय अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं।


वही जानकारी के अनुसार ताजा मामला जनपद पंचायत नैनपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत परसवाड़ा का है, जहां उपसरपंच अश्वनी कुमार पड़वार ने पंचायत सचिव नर्मदा प्रसाद के खिलाफ कलेक्टर मंडला को जनसुनवाई में शिकायत सौंपते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है।


ग्रामीणों के काम ठप, सचिव का पता नहीं
शिकायत के अनुसार पंचायत सचिव लंबे समय से मुख्यालय में निवास नहीं कर रहे हैं और न ही पंचायत कार्यालय में नियमित रूप से उपस्थित होते हैं। परिणामस्वरूप जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, आय-निवास प्रमाण पत्र, पेंशन, प्रधानमंत्री आवास, मनरेगा और अन्य शासकीय योजनाओं से जुड़े कार्य समय पर नहीं हो पा रहे हैं।


ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत कार्यालय अक्सर बंद मिलता है और सचिव के नहीं मिलने से लोगों को कई-कई बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे न केवल आम नागरिक परेशान हैं बल्कि पंचायत के विकास कार्य भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।


पंचायत विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई सचिव महीनों तक मुख्यालय में नहीं रह रहा और कार्यालय में नियमित उपस्थिति नहीं दे रहा, तो जनपद पंचायत और जिला पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे हैं? क्या उपस्थिति रजिस्टर की जांच नहीं होती? क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है? क्या अधिकारियों की मिलीभगत से नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं?
यदि समय रहते कार्रवाई होती तो शायद ग्रामीणों को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।


नियम कहते हैं मुख्यालय में रहना अनिवार्य
पंचायत सचिवों को शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे पंचायत मुख्यालय में निवास करें और नियमित रूप से कार्यालय में उपस्थित रहकर ग्रामीणों के कार्य संपादित करें। इसके बावजूद यदि नियमों का पालन नहीं हो रहा है तो यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता भी मानी जाएगी।


ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश
परसवाड़ा के ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत व्यवस्था अब जनता की सेवा के बजाय अधिकारियों और कर्मचारियों की सुविधा का माध्यम बन गई है। विकास कार्यों की गति धीमी पड़ गई है और योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक समय पर नहीं पहुंच पा रहा।


ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो वे जनआंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
कलेक्टर से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग उपसरपंच अश्वनी कुमार पड़वार ने कलेक्टर मंडला से मांग की है कि सचिव की उपस्थिति, मुख्यालय निवास और कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित सचिव को तत्काल हटाते हुए विभागीय दंडात्मक कार्रवाई की जाए ताकि पंचायत व्यवस्था में जनता का विश्वास कायम रह सके।


सवाल जनता का
जब पंचायत सचिव ही पंचायत से गायब हैं, तो ग्रामीणों की समस्याएं कौन सुनेगा?
जब जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण नहीं करेंगे, तो पंचायत राज व्यवस्था कैसे मजबूत होगी?


क्या मंडला जिले में पंचायतों की बदहाली पर जिला प्रशासन कोई ठोस कदम उठाएगा या शिकायतें फाइलों में ही दबकर रह जाएंगी?
अब निगाहें कलेक्टर मंडला और पंचायत विभाग पर टिकी हैं कि वे जनता की शिकायत को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

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