दैनिक रेवांचल टाईम्स – देश में आए दिन किसी न किसी दिवस के आयोजन की परंपरा तेजी से बढ़ रही है। विश्व पर्यावरण दिवस, विश्व योग दिवस, विश्व साइकिल दिवस, विश्व पोहा दिवस और ऐसे अनेक आयोजन समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से मनाए जाते हैं। निस्संदेह इनका अपना महत्व है और इनके माध्यम से सकारात्मक संदेश भी दिए जाते हैं। लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इन आयोजनों के बीच हम उन वास्तविक समस्याओं को कहीं पीछे तो नहीं छोड़ रहे, जो समाज की जड़ों को खोखला कर रही हैं?
आज देश और प्रदेश का सबसे बड़ा सामाजिक संकट यदि कोई है, तो वह है बढ़ती नशा प्रवृत्ति। शराब, गांजा, नशीली गोलियां, सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य मादक पदार्थों की गिरफ्त में युवा पीढ़ी तेजी से फंसती जा रही है। गांव से लेकर शहर तक नशे का जाल फैलता जा रहा है। परिवार टूट रहे हैं, अपराध बढ़ रहे हैं, सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं, स्वास्थ्य बर्बाद हो रहा है और मेहनतकश परिवारों की कमाई नशे की भेंट चढ़ रही है।
ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारों को केवल उत्सव और दिवसों के आयोजन तक सीमित रहना चाहिए, या फिर नशा उन्मूलन को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना चाहिए?
यदि पर्यावरण बचाने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा सकता है, स्वास्थ्य के लिए योग दिवस मनाया जा सकता है, तो फिर नशे से समाज को बचाने के लिए व्यापक स्तर पर विश्व नशा विरोधी दिवस को जन आंदोलन का स्वरूप क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? ऐसा दिवस केवल औपचारिकता न होकर जनजागरण का अभियान बने, जिसमें स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों, नगर निकायों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
नशा केवल व्यक्ति को नहीं मारता, वह पूरे परिवार की खुशियां छीन लेता है। नशा धन की हानि करता है, स्वास्थ्य को नष्ट करता है, सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म करता है और सभ्यता एवं संस्कारों पर भी गहरा प्रहार करता है। जिस युवा शक्ति के कंधों पर देश का भविष्य टिका है, यदि वही नशे की गिरफ्त में चली जाए तो विकास के सारे दावे खोखले साबित हो सकते हैं।
एक और गंभीर प्रश्न यह है कि जब गांव-गांव में अवैध शराब और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तब प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर भी सवाल उठते हैं। यदि कहीं आबकारी विभाग या पुलिस तक जानकारी नहीं पहुंच पा रही है, या कार्यवाही में ढिलाई दिखाई देती है, तो कानून के दायरे में रहते हुए जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे मामलों की सूचना संबंधित विभागों को दे और अवैध गतिविधियों के विरुद्ध आवाज उठाए।
यह लड़ाई केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की है। सरकार कानून बना सकती है, अभियान चला सकती है, लेकिन जब तक जनता स्वयं नशे के खिलाफ खड़ी नहीं होगी, तब तक स्थायी परिवर्तन संभव नहीं है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें केवल उत्सवों और प्रचार कार्यक्रमों तक सीमित न रहें, बल्कि नशा उन्मूलन को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार के साथ जोड़कर एक व्यापक राष्ट्रीय मिशन बनाएं। हर गांव, हर वार्ड और हर मोहल्ले में नशा विरोधी जागरूकता अभियान चलाए जाएं। स्कूलों में बच्चों को नशे के दुष्प्रभाव बताए जाएं और युवाओं को खेल, शिक्षा और रोजगार की ओर प्रेरित किया जाए।
वर्तमान समय का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम आने वाली पीढ़ियों को नशे के अंधकार में धकेलते रहेंगे या उन्हें स्वस्थ, जागरूक और सशक्त भारत का नागरिक बनाएंगे?
दिवस मनाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन यदि किसी दिवस का उद्देश्य समाज की सबसे गंभीर समस्या पर प्रहार करना हो, तो उसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। शायद अब समय आ गया है कि सरकार, समाज और जनता मिलकर नशे के खिलाफ एक ऐसी मुहिम शुरू करें, जो केवल एक दिन का आयोजन न होकर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने का संकल्प बने।
क्योंकि सच यही है कि नशे में किसी का लाभ नहीं, नुकसान ही नुकसान है। और जिस राष्ट्र की युवा शक्ति नशे से हार जाती है, उसका भविष्य भी कमजोर पड़ जाता है।
"आज़ाद क़लम"
