
आखिर किसे बचा रहा प्रशासन?
पेंचवर्क और वीसी रूम निर्माण में अनियमितताओं के आरोप,
एक माह बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में हुए कथित 72 लाख रुपये के पेंचवर्क और वीसी रूम निर्माण घोटाले की जांच अब खुद सवालों के घेरे में आ गई है। जिला प्रशासन द्वारा जांच के आदेश, समिति का गठन, अधिकारियों को नोटिस और दोबारा जांच के निर्देश—इन सबके बावजूद आज तक किसी दोषी पर कार्रवाई नहीं होना यह संकेत दे रहा है कि कहीं न कहीं पूरा मामला दबाने की कोशिश की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतें गंभीर थीं, जांच समिति गठित हुई, रिपोर्ट भी प्रस्तुत हुई और अधिकारियों को नोटिस भी जारी हुए, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर किसके दबाव में प्रशासन पीछे हट गया? क्या करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये के इस कथित खेल के जिम्मेदारों को बचाने की कवायद चल रही है?
पहली जांच में अनियमितताएं मिलीं तो दूसरी जांच का सहारा
वर्ष 2025 में बारिश के बाद जिले की सड़कों पर लगभग 70 लाख रुपये खर्च कर पेंचवर्क कराया गया था। इसके अलावा जिले के तीन विधायकों के लिए करीब 2.32 लाख रुपये की लागत से वीसी रूम बनाए गए थे। इन कार्यों को लेकर गुणवत्ता, लागत और प्रक्रिया संबंधी गंभीर शिकायतें जिला प्रशासन तक पहुंची थीं।
अपर कलेक्टर के नेतृत्व में गठित चार सदस्यीय जांच समिति ने करीब दो माह तक जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किए गए। लेकिन जैसे ही जवाब आए, पूरी जांच को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया गया।
क्या जांच सिर्फ दिखावा थी?
सूत्रों के अनुसार जांच टीम ने स्थलों का निरीक्षण किया, फोटो लिए और अधिकारियों की मौजूदगी में तथ्य जुटाए, लेकिन पंचनामा तैयार नहीं किया गया। यही तकनीकी खामी बाद में पूरी जांच को कमजोर करने का आधार बन गई।
अब सवाल यह उठता है कि यदि जांच में इतनी बड़ी प्रक्रिया संबंधी चूक हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या यह मात्र लापरवाही थी या फिर जानबूझकर छोड़ा गया ऐसा रास्ता, जिससे भविष्य में दोषियों को बचाया जा सके?
20 दिन की समय-सीमा खत्म, फिर भी रिपोर्ट गायब
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन कलेक्टर द्वारा 6 अप्रैल 2026 को दोबारा जांच के आदेश दिए गए। संयुक्त कलेक्टर, पीआईयू के कार्यपालन यंत्री और सहायक कोषालय अधिकारी की नई टीम गठित की गई। टीम को 15 दिनों के भीतर जांच पूरी कर प्रतिवेदन सौंपने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन अब एक माह से अधिक समय बीत चुका है। न रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, न किसी दोषी पर कार्रवाई हुई और न ही प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी सामने आई।
आखिर जांच रिपोर्ट किस अलमारी में बंद है?
यदि दूसरी जांच पूरी हो चुकी है तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? यदि जांच पूरी नहीं हुई तो देरी का कारण क्या है? और यदि जांच में अनियमितताएं सामने आई हैं तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
इन सवालों का जवाब जिला प्रशासन और पीडब्ल्यूडी दोनों को देना चाहिए।
क्या भ्रष्टाचारियों पर मेहरबान है सिस्टम?
जिले में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि प्रशासनिक स्तर पर मामले को ठंडा करने की कोशिश की जा रही है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि सामान्य कर्मचारी छोटी सी गलती पर निलंबित हो सकता है, तो लाखों रुपये के कार्यों में अनियमितताओं के आरोपों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
जनता पूछ रही है कि क्या सरकारी धन के दुरुपयोग के मामलों में भी अब कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह गई है? क्या जांच समितियां केवल समय निकालने और जनाक्रोश शांत करने का माध्यम बन गई हैं?
जिला प्रशासन को देना होगा जवाब
अब जिला प्रशासन के सामने कई सीधे सवाल खड़े हैं—
पहली जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकले थे?
नोटिस जारी होने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दूसरी जांच रिपोर्ट कहां है?
जांच में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?
यदि अनियमितताएं हुई हैं तो दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?
क्या प्रशासन भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण दे रहा है?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक पीडब्ल्यूडी के इस कथित 72 लाख रुपये के खेल पर संदेह और गहराता जाएगा।
जनता अब केवल जांच नहीं, बल्कि जांच के परिणाम और दोषियों पर ठोस कार्रवाई देखना चाहती है। अन्यथा यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा, जहां भ्रष्टाचार की कहानियां तो दर्ज होती हैं, लेकिन दोषियों तक कानून का हाथ कभी नहीं पहुंचता।
यह संस्करण प्रशासन और विभाग से जवाबदेही मांगते हुए अधिक तीखा और खोजी पत्रकारिता शैली में तैयार किया गया है, जबकि आरोपों को तथ्यात्मक रूप से “कथित”, “आरोप”, “सवाल” और “शिकायत” के रूप में प्रस्तुत करता है।
