प्रतिबंध के दो महीने, विभाग का“रिकॉर्ड” कार्रवाई सिर्फ दो क्विंटल मछली जब्त

Revanchal
11 Min Read

मंडला के बाजारों में खुलेआम बिक रही मछलियां, रोजाना कई क्विंटल बिक्री का दावा

सवाल जब आखेट बंद तो मछली बाजार तक कैसी पहुंच रही

रेवांचल टाइम्स, मंडला। मां नर्मदा की गोद में बसे मंडला जिले में मत्स्य संपदा के संरक्षण को लेकर शासन के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आ रहा है। एक ओर मध्यप्रदेश शासन द्वारा मछलियों के प्रजनन काल को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से 15 जून से 15 अगस्त तक मछली आखेट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय मंडला के कई बाजारों में प्रतिबंध के दौरान भी कथित तौर पर खुलेआम ताजा मछलियों की बिक्री जारी है।

शहर के रमपुरा, कारिकोंन, तिराहा हांगगंज, बाजार आमानाला, महाराजपुर बाईपास और पुरवा सहित कई स्थानों पर मछलियों की बिक्री हो रही है । स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन स्थानों पर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में मछलियां पहुंच रही हैं

जब मछली आखेट प्रतिबंधित है, तो बाजारों में बिकने वाली यह मछलियां आखिर आ कहां से रही हैं और उससे भी बड़ा सवाल क्या मत्स्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई प्रभावी नहीं हो रही।

दो महीने में सिर्फ दो क्विंटल जब्ती, इसे कार्रवाई कहें या खानापूर्ति

मत्स्य आखेट पर प्रतिबंध की अवधि लगभग दो महीने की है। इस दौरान विभाग द्वारा करीब दो क्विंटल मछली जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। विभाग इसे कार्रवाई का हिस्सा बता सकता है, लेकिन बाजारों की कथित स्थिति को देखते हुए यही आंकड़ा अब सवालों के घेरे में है।

स्थानीय स्तर पर आरोप है कि जब प्रतिबंध अवधि में बाजारों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में मछलियां बिक रही हैं, तो करीब 50 दिनों में केवल दो क्विंटल मछली की जब्ती किस प्रकार की निगरानी व्यवस्था को दर्शाती है

यदि रोजाना बाजारों में कई क्विंटल मछलियों की बिक्री हो रही है तो दो महीने में सिर्फ दो क्विंटल जब्ती का आंकड़ा क्या विभाग की सक्रियता का प्रमाण है या फिर कार्रवाई की औपचारिकता

क्या विभाग ने जितनी मछली पकड़ी, उससे कहीं ज्यादा मात्रा में हर दिन मछली खुले बाजार में विक्रय की जा रही
यह सवाल अब आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
पांच दिन बचेंगे तो होगी कार्रवाई

सबसे दिलचस्प स्थिति यह है कि प्रतिबंध अवधि समाप्त होने में अब कुछ ही दिन शेष बताए जा रहे हैं। विभाग की ओर से लगातार कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने की बात कही जा रही है।लेकिन सवाल यह है कि जब प्रतिबंध अवधि का अधिकांश हिस्सा बीत गया, तब बाकी बचे कुछ दिनों में ऐसी कौन-सी कार्रवाई होगी जो पिछले लगभग दो महीने की कथित निष्क्रियता की भरपाई कर सकेगी।क्या अब अचानक बाजारों में छापे पड़ेंगे क्या नर्मदा तट पर निगरानी बढ़ाई जाएगी क्या अवैध आखेट करने वालों तक टीम पहुंचेगी या फिर प्रतिबंध की अवधि खत्म होते ही पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

मछली बाजार में उपलब्ध, विभाग के पास जवाब नहीं!

प्रतिबंध का सीधा अर्थ है कि निर्धारित अवधि में मछली पकड़ने पर रोक रहेगी। ऐसे में यदि बाजार में मछली बिक रही है तो उसके स्रोत की जांच करना विभाग की जिम्मेदारी बनती है।क्या यह मछलियां प्रतिबंध से पहले के वैध स्टॉक से हैं क्या इनके पास वैध भंडारण और परिवहन से संबंधित दस्तावेज हैं क्या मछलियां किसी दूसरे जिले या वैध स्रोत से लाई जा रही हैं या फिर नर्मदा नदी और अन्य जलाशयों से चोरी-छिपे आखेट कर मछलियों को बाजार तक पहुंचाया जा रहा है यदि वैध स्टॉक का दावा है तो उसका सत्यापन होना चाहिए। यदि अवैध आखेट हो रहा है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।लेकिन बाजार में मछली पहुंच रही है और विभाग कार्रवाई के आश्वासन तक सीमित है तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

मत्स्य कार्यालय में व्यापारियों की आवाजाही भी चर्चा में

सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा सामने आ रही है कि प्रतिबंध अवधि के दौरान मत्स्य कार्यालय में मछली व्यापार से जुड़े लोगों की आवाजाही बनी रहती है। कुछ स्थानीय लोगों द्वारा इसे विभाग और व्यापारियों के बीच कथित सांठगांठ की आशंका से जोड़कर देखा जा रहा है
आखिर प्रतिबंध अवधि में मछली व्यापारियों की गतिविधियों और उनके स्टॉक की जांच कितनी बार हुई। कितने व्यापारियों से स्टॉक का विवरण मांगा गया कितने परिवहन वाहनों की जांच हुई
कितने मामलों में वैध दस्तावेज मिले और कितने मामलों में कार्रवाई की गई इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
प्रजनन काल में आखेट से नर्मदा की जैव विविधता पर संकट
मछली आखेट पर प्रतिबंध महज सरकारी कागज की कार्रवाई नहीं है। इसका मूल उद्देश्य मछलियों के प्रजनन काल को सुरक्षित रखना है।जून से अगस्त के बीच अनेक स्थानीय मछली प्रजातियों के प्रजनन का महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान मछलियां अंडे देती हैं और नई पीढ़ी विकसित होती है। यदि इसी समय बड़े पैमाने पर मछलियों का शिकार किया जाता है तो इसका सीधा असर भविष्य के मत्स्य संसाधन पर पड़ सकता है।मां नर्मदा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि हजारों जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास भी है। नर्मदा की जैव विविधता को बचाने के लिए प्रजनन काल में आखेट पर प्रतिबंध लगाया जाता है।लेकिन यदि प्रतिबंध केवल आदेश जारी करने तक सीमित रह जाए और जमीन पर उसका पालन न हो तो फिर संरक्षण की पूरी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है।

करोड़ों की योजनाएं, लेकिन निगरानी कहां

सरकार द्वारा मत्स्य उत्पादन बढ़ाने, मत्स्य बीज डालने और मछुआरों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जाती हैं। नदियों और जलाशयों में मत्स्य बीज छोड़े जाते हैं। संरक्षण और संवर्धन पर सरकारी राशि खर्च होती है।

लेकिन सवाल यह है कि जब मछलियों के प्रजनन काल में ही कथित अवैध आखेट जारी रहेगा तो इन योजनाओं का वास्तविक लाभ कितना मिलेगा

एक तरफ मछली के बीज डालने पर सरकारी पैसा खर्च हो और दूसरी तरफ उसी मछली को प्रजनन से पहले पकड़कर बाजार में बेच दिया जाए—तो फिर संरक्षण का अर्थ क्या रह जाता है?

बाजार में खुलेआम बिक्री, विभाग की निगरानी पर सवाल

यदि शहर के बाजारों में मछली खुलेआम बिक रही है तो यह जांच का विषय है कि प्रतिबंधित अवधि में दुकानदारों तक मछली पहुंचाने वाला नेटवर्क कौन संचालित कर रहा है।

सिर्फ बाजार में बैठा विक्रेता ही जिम्मेदार नहीं हो सकता। मछली की सप्लाई चेन की जांच आवश्यक है। मछली कहां पकड़ी गई किसने पकड़ी किस वाहन से लाई गई किसने खरीदी किसने बाजार में पहुंचाई यदि इन सवालों के जवाब खोजे जाएं तो कथित अवैध कारोबार की पूरी कड़ी सामने आ सकती है।

स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण से जुड़े लोगों ने जिला प्रशासन एवं मत्स्य विभाग से मांग की है कि प्रतिबंध अवधि के दौरान विशेष अभियान चलाया जाए। नर्मदा नदी, जलाशयों और संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त बढ़ाई जाए।

मछली बाजारों में अचानक निरीक्षण हो। व्यापारियों के स्टॉक और मछलियों के स्रोत की जांच हो। परिवहन वाहनों की जांच की जाए। यदि अवैध आखेट, परिवहन या बिक्री सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।

बड़ा सवाल—दो क्विंटल जब्ती या दो महीने की खानापूर्ति

अब मामला केवल मछली पकड़ने और बेचने का नहीं है। मामला यह है कि शासन ने प्रतिबंध लगाया, लेकिन क्या विभाग उसे जमीन पर लागू करा पाया

करीब दो महीने की अवधि में यदि विभाग द्वारा केवल दो क्विंटल मछली जब्त की गई और दूसरी ओर बाजारों में कथित तौर पर रोजाना बड़ी मात्रा में मछलियां बिकती रहीं, तो विभाग को अपने आंकड़ों और अपनी निगरानी व्यवस्था का हिसाब देना चाहिए।

क्या दो क्विंटल की जब्ती वास्तव में बड़ी उपलब्धि है या फिर प्रतिबंध अवधि की खानापूर्ति का आंकड़ा

क्या बाजारों में बिक रही मछलियों का स्रोत कभी जांचा गया

क्या नर्मदा और अन्य जलाशयों में अवैध आखेट रोकने के लिए नियमित गश्त हुई क्या मुख्य सप्लायरों तक विभाग पहुंचा
और यदि नहीं पहुंचा तो क्यों
इन सवालों का जवाब अब जिला प्रशासन और मत्स्य विभाग को देना होगा।

मां नर्मदा की जैव विविधता किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। प्रतिबंध की घोषणा करके यदि विभाग चैन की नींद सोता रहा और बाजारों में मछलियों की बिक्री जारी रही तो आने वाले समय में इसका खामियाजा नर्मदा की मत्स्य संपदा को भुगतना पड़ सकता है।

अब देखना यह है कि प्रतिबंध की अवधि खत्म होने से पहले विभाग वास्तव में मैदान में उतरता है या फिर दो क्विंटल मछली जब्ती का आंकड़ा दिखाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है।

👁️ 1 views Views
Share This Article
Translate »