डेंगू-मलेरिया के नाम पर हर साल करोड़ों खा जाते हैं प्रशासन, नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग को चेतावनी : इस बार सोना नहीं, जागकर काम करना होगा

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डेंगू-मलेरिया के नाम पर हर साल करोड़ों खा जाते हैं प्रशासन, नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग को चेतावनी : इस बार सोना नहीं, जागकर काम करना होगा

जबलपुर में जलभराव और गंदगी कोई नई बात नहीं, लेकिन क्या हर बार बीमारियों से मौत का इंतज़ार ही एकमात्र नीति रह गई है?
डेंगू मलेरिया के नाम पर हर साल अिधकारी करोड़ों रुपए खा जाते हैं। कभी जांच के नाम पर तो कभी सफाई के नाम पर…फिर भी डेंगू मलेरिया की त्रासदी से शहर को मुक्ति नहीं मिल पा रही है। जमीनी हकीकत यह है कि बारिश की शुरुआत के साथ ही जबलपुर की सडक़ों पर पानी भरना, नालियों से कचरे का बहकर आना और मोहल्लों में गंदगी के ढेर लगना एक स्थायी दृश्य बन चुका है। वर्षों से यह स्थिति दोहराई जा रही है – और नतीजा हर बार एक जैसा होता है-डेंगू, मलेरिया, वायरल बुखार और अस्पतालों में बढ़ती भीड़।

अभी भी समय है – वरना आने वाले दिनों में यह बीमारियाँ विकराल रूप ले लेंगी

स्वास्थ्य विभाग की ओर से न तो अभी तक कोई ठोस सर्वे, न एंटी-लार्वा छिडक़ाव, न फॉगिंग अभियान चलाया गया है। नगर निगम के कर्मचारी सफाई व्यवस्था के नाम पर सिर्फ सोशल मीडिया और विज्ञापनों में सक्रिय हैं। वास्तविकता यह है कि हर सोसाइटी के नीचे कचरे का अंबार है और नालियां ओवरफ्लो हो रही हैं।

विगत वर्षों में दर्ज आंकड़े यही कहते हैं कि जबलपुर में अगस्त-सितंबर आते-आते डेंगू और मलेरिया के केस सैकड़ों में पहुंच जाते हैं। अस्पतालों में पलंग कम पडऩे लगते हैं, निजी अस्पतालों में इलाज महंगा हो जाता है और गरीब तबका सबसे अधिक पीड़ित होता है।

सडक़ों पर सन्नाटा, बीमारियों का शोर

शहर के अधिकांश मोहल्लों और कॉलोनियों में हालत यह है कि लोगों को घर से निकलना भी भारी पड़ रहा है। शारदा चौक, ग्वारीघाट, रांझी, आधारताल, मदन महल और विजय नगर जैसे प्रमुख क्षेत्रों में जलभराव और कचरा प्रमुख समस्याएं बन चुके हैं। नगर निगम की गाडिय़ाँ नदारद हैं, और सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है।

कचरे में पनपता डेंगू और मलेरिया का खतरा

खुले कचरे में जमा पानी अब डेंगू और मलेरिया के मच्छरों की उत्पत्ति का केंद्र बन चुका है। विगत कुछ दिनों में शहर के कई निजी और सरकारी अस्पतालों में वायरल बुखार, डेंगू व मलेरिया के मरीजों की संख्या में इजाफा देखा गया है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से न तो कोई विशेष सतर्कता अभियान चलाया गया है और न ही फॉगिंग या एंटी-लार्वा छिड़काव की कोई पहल देखी गई है।

Every year the administration spends crores of rupees in the name of dengue and malaria
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हर साल एक जैसी कहानी : कब जागेगा प्रशासन?

प्रत्येक वर्ष बारिश के समय जब डेंगू और मलेरिया अपने चरम पर पहुंचते हैं, तब जाकर नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटती है। तब तक हालात इतने बिगड़ चुके होते हैं कि अस्पतालों में पलंग भी कम पड़ने लगते हैं। इस बार भी यही कहानी दोहराई जा रही है।
अभी अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो आगामी 10-15 दिनों में जबलपुर एक बार फिर बीमारियों के साए में घिर सकता है।

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नेता और प्रशासन का मौन रवैया

शहर के जनप्रतिनिधि, पार्षद और विधायक इस स्थिति पर मौन हैं। न कोई निरीक्षण, न कोई जागरूकता अभियान और न ही जन संवाद। ऐसा प्रतीत होता है मानो जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है।
कई स्थानों पर लोगों ने अपने स्तर पर सफाई शुरू की है, लेकिन बिना प्रशासनिक मदद के यह लड़ाई अधूरी है।

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प्रशासन से तीखे सवाल – अब क्यों नहीं जागते?

क्या हर साल मृतकों की संख्या बढ़ने पर ही चेतना जरूरी है?

क्या आम जनता की बीमारी और मौत का इंतजार प्रशासनिक काम का हिस्सा बन चुका है?

क्यों अब तक फॉगिंग, दवाई का छिड़काव, सफाई अभियान शुरू नहीं हुए?

स्वास्थ्य विभाग की टीमें किसे जवाबदेह हैं?

क्यों नगर निगम सफाई व्यवस्था को बारिश का बहाना बनाकर टाल रहा है?

रेवांचल टाइम्स की खुली चेतावनी : “अब नहीं जागे, तो फिर देर हो जाएगी!’

यह वक्त है जब नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को मिलकर सामूहिक अभियान छेड़ना चाहिए।

आखिरी में जागना नहीं, पहले ही काम करना पड़ेगा

यदि प्रशासन इस बार भी वही पुरानी गलती दोहराता है – आखिरी में जागो, जब जानें जा चुकी हों, तो इसका मतलब है कि जनता को बार-बार अंधेरे में रखकर बीमारी का शिकार बनने के लिए छोड़ा जा रहा है।

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