नेमा हार्ट अस्पताल तो सिर्फ एक उदाहरण है, जबलपुर में दर्जनों निजी अस्पताल अनियमितताओं के भरोसे चल रहे
– अतुल कुमार
दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर। इनकी चारदीवारी में न कोई नियम चलता है, न कायदा…क्योंकि इनका मकसद सिर्फ फायदा होता है। मानवीय संवेदना तो मानो बची ही नहीं है। नेमा हार्ट केयर हॉस्पिटल में सामने आई लापरवाही केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर की पूरी चिकित्सा व्यवस्था के माथे लगे कलंक से कम नहीं है।
यह घटना जबलपुर के निजी अस्पतालों में व्याप्त अव्यवस्थाओं और घोर लापरवाही का एक छोटा सा नमूना मात्र है। शहर में ऐसे दर्जनों अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जहां नियम-कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है, लेकिन इनकी निगरानी करने वाला कोई ठोस तंत्र नजर नहीं आता।
नेमा हार्ट अस्पताल में डॉक्टरों और स्टाफ की अनुपस्थिति के कारण एक बुजुर्ग मरीज की मौत ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। न दिन में और न ही रात में पूर्ण चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं,
फिर भी अस्पताल सरकारी योजनाओं के तहत सूचीबद्ध होकर मरीजों का इलाज करने का दावा कर रहे हैं। सिर्फ कागजों में चल रहे ऐसे अस्पताल जमीनी स्तर पर मरीजों के लिए जीवन रक्षक नहीं, बल्कि मौत का कारण बनते जा रहे हैं।
यह सवाल अब केवल एक पीड़ित परिवार तक सीमित नहीं रहा। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि शहर के कई निजी अस्पतालों में प्रशिक्षित डॉक्टरों की तैनाती नहीं की गई है, इमरजेंसी सेवाएं नाम मात्र की हैं और नर्सिंग स्टाफ भी अधूरा व अनुभवहीन है।
जांच और उपचार की व्यवस्था कागजी रिकॉर्ड में दुरुस्त दिखाई जाती है, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और जिला स्वास्थ्य अधिकारी आंखों पर पट्टी बांधे बैठे नजर आ रहे हैं। नियमित निरीक्षण और समय-समय पर अस्पतालों की जांच का जो दावा विभाग करता है, वह धरातल पर सफल होता दिखाई नहीं देता।
हर महीने किसी न किसी अस्पताल में लापरवाही की खबर सामने आती है, लेकिन जांच और कार्रवाई तब ही होती है, जब कोई दर्दनाक घटना घट जाती है।
आम जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर प्रशासन और स्वास्थ्य अधिकारी कब जागेंगे? क्या हमेशा किसी की मौत के बाद ही कार्रवाई होगी? क्या स्वास्थ्य व्यवस्था केवल हादसों का इंतजार कर रही है? प्राथमिक जांच के नाम पर खानापूर्ति कर ली जाती है और कार्रवाई का डर सिर्फ छोटे कर्मचारियों या निम्न स्तर के स्टाफ तक सीमित रह जाता है, जबकि असली जिम्मेदार बच निकलते हैं।
शहर में नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। कई अस्पताल बिना मान्यता, बिना पर्याप्त डॉक्टर स्टाफ और बिना आवश्यक उपकरणों के संचालन कर रहे हैं। फायर सेफ्टी, इमरजेंसी सुविधा, लाइसेंस नवीनीकरण और स्वच्छता नियमों का पालन नहीं किया जा रहा, लेकिन संबंधित विभाग इन गंभीर लापरवाहियों पर चुप्पी साधे हुए हैं।
नेमा हार्ट अस्पताल की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर समय रहते प्रशासन ने कठोर कदम नहीं उठाए तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी और आम नागरिक व्यवस्था की भेंट चढ़ता रहेगा।
जरूरत है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सिर्फ कागजी निरीक्षण नहीं, बल्कि ज़मीनी जांच कर दोषी अस्पतालों पर सख्त कार्रवाई करे।
जनता अब यही पूछ रही है — क्या अगली कार्रवाई भी किसी और जान के जाने के बाद होगी? या अब स्वास्थ्य अधिकारी और प्रशासन नींद से जागकर व्यवस्था सुधारने का साहस दिखाएंगे?
