कानून व्यवस्था पर बड़े सवाल जिले की काननू व्यवस्था हुई बैपटरी…
दैनिक रेवांचल टाईम्स- मंडला। जिले की पुलिस कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा मंडला पुलिस अधीक्षक को कड़ी फटकार लगाते हुए यह पूछना कि “क्या आपके जिले में अधिकारी आंख बंद कर कागजों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं?”—अब पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
मामला अन्नू आदिवासी नामक दोषी से जुड़ा है, जिसने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में सजा काटते हुए अपने भाई की शादी में शामिल होने के लिए अस्थायी जमानत मांगी थी। आरोपी ने कोर्ट को बताया कि उसके भाई की शादी 17 अप्रैल को है।

जब कोर्ट ने इस जानकारी के सत्यापन के लिए संबंधित थाना पुलिस से रिपोर्ट मांगी, तो पुलिस द्वारा दी गई जानकारी में गंभीर खामियां सामने आईं। इसी पर नाराज होते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल एवं जस्टिस ए.के. सिंह की पीठ ने मंडला पुलिस अधीक्षक से तीखे सवाल किए और कार्यप्रणाली पर नाराजगी जाहिर की।
एक मामला नहीं, सवालों की लंबी फेहरिस्त
हाईकोर्ट की यह सख्ती ऐसे समय आई है, जब जिले में पहले से ही पुलिस की कार्यशैली को लेकर असंतोष के स्वर सुनाई देते रहे हैं।
विभिन्न घटनाओं और शिकायतों को लेकर आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों द्वारा निष्पक्ष जांच की मांग समय-समय पर उठती रही है।
“प्रतिबंध के बावजूद शराब का खुला खेल?”
मंडला नगर, जिसे माँ नर्मदा तीन ओर से घेरती हैं, वहां पूर्व में सरकार द्वारा नर्मदा तट से 5 किलोमीटर तक शराब बिक्री पर प्रतिबंध लागू किया गया था।
इसके बावजूद नगर एवं आसपास के क्षेत्रों में अवैध शराब बिक्री की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
ढाबों और उपनगरीय क्षेत्रों में खुलेआम शराब परोसने के आरोप
छोटे दुकानों तक शराब की पहुंच
कार्रवाई को लेकर प्रशासन की चुप्पी
ये सब मिलकर कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
अवैध कारोबार बनाम कार्रवाई—क्या है सच्चाई?
जिले में अवैध रेत उत्खनन, सट्टा संचालन और ओवरलोडिंग जैसे मामलों की शिकायतें भी लगातार उठती रही हैं।
आम लोगों का कहना है कि जहां एक ओर छोटी मोटी चेकिंग कार्रवाई दिखाई देती है, वहीं बड़े स्तर पर चल रहे नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण नजर नहीं आता।
पत्रकारों पर दबाव के आरोप
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप सामने आते रहे हैं कि जब भी कोई पत्रकार इन मुद्दों को उजागर करता है, तो उसे प्रशासनिक कार्रवाई या दबाव का सामना करना पड़ता है।
हालांकि, इन आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर भी चिंता बढ़ती है।
अब क्या होगा?
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
क्या गलत रिपोर्टिंग पर कार्रवाई होगी?
क्या जिले में कानून व्यवस्था को लेकर ठोस सुधार देखने को मिलेगा?
जनता पूछ रही—जवाब कौन देगा?
मंडला की जनता अब जवाब चाहती है—
क्या कानून का राज सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा, या जमीन पर भी दिखाई देगा?
