दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला-
मंडला जिले की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था ने एक बार फिर एक आदिवासी परिवार को उजाड़ दिया। नैनपुर क्षेत्र में कथित झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज के बाद एक 30 वर्षीय आदिवासी महिला की मौत हो गई, जिसके बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना डिग्री और बिना वैधानिक अनुमति के इलाज करने वालों को प्रशासन का संरक्षण आखिर कब तक मिलता रहेगा?
प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम कारापाठा थाना केवलारी चंपा उइके पति संजय उइके उम्र लगभग 30 वर्ष को अचानक पेट दर्द की शिकायत हुई। परिजन उसे मालनवाड़ा क्षेत्र के एक कथित झोलाछाप डॉक्टर के पास ले गए, जहां उसे बॉटल चढ़ाई गई। बताया जा रहा है कि बॉटल लगने के कुछ ही देर बाद उसकी हालत बिगड़ गई और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
मृतका अपने पीछे 10 वर्षीय बेटा और 8 वर्षीय बेटी छोड़ गई है। दोनों मासूम बच्चों के सिर से मां का साया उठ जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पति संजय उइके गहरे सदमे में बताए जा रहे हैं।
सरकारी डॉक्टरों और झोलाछाप नेटवर्क पर गंभीर सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि युवती की हालत बिगड़ने के बाद झोलाछाप डॉक्टर ने उसे नैनपुर के एक सरकारी डॉक्टर के निजी क्लीनिक भेज दिया। वहां भी जब स्थिति संभलती नहीं दिखी तो मरीज को सिविल अस्पताल नैनपुर रेफर कर दिया गया। अस्पताल में ड्यूटी डॉक्टर द्वारा ईसीजी के बाद मृत घोषित कर शव परिजनों को सौंप दिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर झोलाछाप डॉक्टरों और कुछ सरकारी डॉक्टरों के बीच यह कथित “रेफरल नेटवर्क” कब से चल रहा है? ग्रामीणों का आरोप है कि पहले अवैध क्लीनिकों में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जाता है, फिर मामला बिगड़ने पर निजी क्लीनिक और अंत में सरकारी अस्पताल भेजकर पूरा घटनाक्रम दबाने की कोशिश होती है।
आदिवासी अंचलों में मौत का कारोबार
मंडला आदिवासी बाहुल्य जिला है, जहां शिक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता की भारी कमी आज भी बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप नजर आती हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं, दवाइयां नहीं और सुविधाएं नाम मात्र की हैं। यही कारण है कि गांव-गांव और गली-चौराहों में बैठे झोलाछाप डॉक्टर गरीब और भोले-भाले आदिवासी परिवारों की मजबूरी का फायदा उठाकर इलाज के नाम पर मौत बांट रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन कथित डॉक्टरों के पास न कोई मान्यता प्राप्त डिग्री होती है और न ही चिकित्सा संचालन का वैध लाइसेंस, फिर भी खुलेआम बॉटल चढ़ाना, इंजेक्शन लगाना और गंभीर मरीजों का इलाज करना आम बात बन चुकी है।
प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि नैनपुर, चिरोडोंगरी इंद्री मालनवाड़ा और आसपास के क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टरों का नेटवर्क वर्षों से सक्रिय है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। आरोप यह भी लग रहे हैं कि कुछ प्रभावशाली लोगों और सरकारी तंत्र की शह के चलते इन पर कार्रवाई नहीं होती।
घटना की जानकारी क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों तक भी पहुंच चुकी है। बताया जा रहा है कि सांसद के दौरे के दौरान भी यह मामला उठाया गया है। वहीं मृतका के रिश्तेदारों के राजनीतिक जुड़ाव के कारण मामले के तूल पकड़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
पोस्टमार्टम से खुल सकते हैं कई राज
आदिवासी समाज में घटना को लेकर भारी आक्रोश है। क्षेत्र में मांग उठ रही है कि मृतका का पोस्टमार्टम कराया जाए ताकि मौत के असली कारण सामने आ सकें। यदि निष्पक्ष जांच हुई तो कथित झोलाछाप डॉक्टरों और उनके नेटवर्क से जुड़े कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
बड़ा सवाल — आखिर जिम्मेदार कौन?
जब सरकारी अस्पतालों में समय पर डॉक्टर नहीं मिलते, एम्बुलेंस व्यवस्था कमजोर रहती है और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं दम तोड़ती नजर आती हैं, तब मजबूरी में गरीब लोग झोलाछाप डॉक्टरों के पास पहुंचते हैं। लेकिन क्या प्रशासन की यह जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे अवैध क्लीनिकों पर तत्काल कार्रवाई करे?
मंडला प्रशासन को अब जवाब देना होगा कि आखिर कब तक आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर मौत का यह खेल चलता रहेगा।
