पीडब्ल्यूडी में टेंडरों का खेल या सरकारी धन की बंदरबांट? अधूरे काम पर दूसरा टेंडर, जांच टीम की चुप्पी पर उठे सवाल

Revanchal
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19 लाख का पहला टेंडर अधूरा, फिर 19.30 लाख का दूसरा ठेका; जांच के आदेश महीनों से ठंडे बस्ते में, आखिर किसे बचाया जा रहा है?

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।
मंडला जिले के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में रेस्ट हाउस और सर्किट हाउस की मरम्मत के नाम पर सरकारी धन के उपयोग और विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। लगभग 19 लाख रुपये के पहले टेंडर का कार्य पूरा हुए बिना ही विभाग ने 19.30 लाख रुपये का दूसरा टेंडर जारी कर दिया। यह पूरा मामला अब केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता का विषय बन गया है।


27 नवंबर 2025 को जारी पहले टेंडर के तहत ठेकेदार को कार्य आवंटित किया गया, लेकिन महीनों बाद भी मौके पर केवल औपचारिक कार्य ही दिखाई दिया। जालीदार दरवाजे और पानी की टंकी के लिए स्टैंड लगाने के अलावा रेस्ट हाउस की हालत आज भी बदहाल बनी हुई है। छतों से सीपेज, टूटी खिड़कियां, खराब विद्युत व्यवस्था और जर्जर भवन यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर स्वीकृत राशि खर्च कहां हुई?


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पहला अनुबंध पूरा ही नहीं हुआ, तो उसी कार्य के लिए मार्च 2026 में दूसरा टेंडर किस नियम के तहत जारी किया गया? क्या पहले ठेकेदार के विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई? क्या पहला अनुबंध विधिवत निरस्त किया गया? यदि नहीं, तो दो-दो टेंडरों की आवश्यकता क्यों पड़ी? इन सवालों का जवाब विभाग अब तक नहीं दे पाया है।
मामले की शिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से लेकर जिला प्रशासन तक पहुंची। अपर कलेक्टर (एडीएम) ने जांच के आदेश भी दिए, लेकिन आदेश के बाद क्या हुआ, यह आज तक जनता को नहीं बताया गया। जांच किस स्तर पर है, किस अधिकारी ने क्या पाया और रिपोर्ट कहां है—इन सभी सवालों पर प्रशासन मौन है।


जिले में यह कोई पहला मामला नहीं है, जहां जांच के आदेश तो तुरंत जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन अंतिम रिपोर्ट वर्षों तक फाइलों में दबी रहती है। इससे यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि जांच समितियां केवल जनता का आक्रोश शांत करने का माध्यम बन रही हैं। यदि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने में आखिर हिचकिचाहट क्यों?
जनता पूछ रही है कि क्या जांच टीम केवल औपचारिकता निभा रही है? यदि अनियमितताएं मिली हैं तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कोई गड़बड़ी नहीं मिली, तो अधूरा काम और दूसरा टेंडर किस आधार पर जारी हुआ?
अब जरूरत केवल जांच समिति गठित करने की नहीं, बल्कि उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने और दोष तय करने की है। यदि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है तो जिम्मेदार अधिकारियों, संबंधित ठेकेदारों और पूरे मामले की निगरानी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अन्यथा यह संदेश जाएगा कि मंडला में जांच केवल कागजों तक सीमित है और सरकारी धन की बंदरबांट करने वालों को प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है।
जनता का सीधा सवाल है—यदि जांच पूरी हो चुकी है तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं? यदि जांच पूरी नहीं हुई तो आखिर देरी किसके हित में हो रही है? क्या जांच का उद्देश्य सच सामने लाना है या समय के साथ पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना?

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