भुआ बिछिया अस्पताल बना ‘रेफरल सेंटर’? सरकारी दवाएं गायब, मरीजों को निजी मेडिकल भेजने के आरोपों से घिरा स्वास्थ्य विभाग

Revanchal
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गरीब मरीजों की जेब पर डाका, अस्पताल परिसर में निजी मेडिकल संचालक की मौजूदगी पर उठे सवाल; क्या विभागीय संरक्षण में चल रहा है पूरा खेल?

दैनिक रेवांचल टाइम्स |मंडला, जिले के विकास खण्ड भुआ बिछिया में सरकार एक ओर सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों को निःशुल्क दवा और बेहतर इलाज देने के लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर भुआ बिछिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की कार्यप्रणाली इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। अस्पताल में इलाज कराने पहुंचे मरीजों और स्थानीय नागरिकों के आरोप स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।


आरोप है कि अस्पताल में दवाएं उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर मरीजों को एक तय निजी मेडिकल दुकान से दवाएं खरीदने के लिए भेजा जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार मरीजों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराने के लिए बजट जारी करती है, तो आखिर मरीजों को अपनी जेब से महंगी दवाएं खरीदने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है? क्या सरकारी दवाओं का स्टॉक वास्तव में खत्म है, या फिर यह निजी मेडिकल दुकानों को फायदा पहुंचाने का सुनियोजित खेल है?


स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिस निजी मेडिकल दुकान से मरीजों को दवा लेने भेजा जाता है, उसके संचालक की अस्पताल परिसर में लगातार मौजूदगी भी कई सवाल खड़े करती है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल नैतिकता का नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था के दुरुपयोग का गंभीर मामला बन जाता है। क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि पूरा खेल खंड चिकित्सा अधिकारी के संरक्षण में संचालित हो रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।


स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी भी संदेह को और गहरा कर रही है। यदि अस्पताल में दवाओं की कमी है तो उसके रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे? और यदि दवाएं उपलब्ध हैं तो मरीजों को निजी दुकानों पर भेजने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इन सवालों का जवाब देने से विभाग आखिर बच क्यों रहा है?
सबसे अधिक परेशान वे गरीब और जरूरतमंद मरीज हैं, जो सरकारी अस्पताल इस उम्मीद से पहुंचते हैं कि उन्हें मुफ्त इलाज और दवाएं मिलेंगी। लेकिन जब उन्हें बाजार से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, तो सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त होता दिखाई देता है।


अब जरूरत केवल औपचारिक जांच की नहीं, बल्कि पूरे दवा वितरण तंत्र की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की है। अस्पताल के दवा स्टॉक रजिस्टर, खरीदी-बिक्री के रिकॉर्ड, मरीजों को लिखी गई दवाओं और निजी मेडिकल दुकानों के बीच संभावित संबंधों की बारीकी से जांच होनी चाहिए। यदि जांच में किसी भी अधिकारी, कर्मचारी या निजी व्यक्ति की मिलीभगत सामने आती है, तो उसके खिलाफ कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई होना आवश्यक है।


जनता का सीधा सवाल है—

क्या सरकारी अस्पताल गरीबों के इलाज के लिए हैं या फिर निजी मेडिकल दुकानों का कारोबार बढ़ाने के लिए? जब तक स्वास्थ्य विभाग इन आरोपों पर पारदर्शी जवाब नहीं देता, तब तक उसकी कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल और गहरे होते रहेंगे।

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