ग्रामीण क्षेत्रों के अध्ययन में सामने आई प्रकृति के बदलते स्वरूप की गंभीर तस्वीर
— शिक्षक एवं पर्यावरण अध्ययनकर्ता नवीन चौरसिया
दैनिक रेवाँचल टाईम्स – मंडला। कभी हरियाली, स्वच्छ जल स्रोतों, पक्षियों की चहचहाहट और प्राकृतिक समृद्धि के लिए पहचाने जाने वाले मंडला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अब पर्यावरणीय असंतुलन के संकेत तेजी से दिखाई देने लगे हैं। सूखते तालाब, घटता जल स्तर, कम होती हरित पट्टियाँ, गायब होते पक्षी और बढ़ता मानवीय दबाव प्रकृति के बदलते स्वरूप की गंभीर कहानी बयां कर रहे हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शिक्षक एवं पर्यावरण अध्ययनकर्ता नवीन चौरसिया द्वारा किए गए क्षेत्रीय अध्ययन ने मंडला क्षेत्र में बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन की चिंताजनक स्थिति को उजागर किया इनके द्वारा बिनैका, जंतीपुर, खैरी, हृदयनगर, नर्मदा नदी तट तथा आसपास के नदी-नालों, तालाबों और ग्रामीण क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन किया गया।
अध्ययन में सामने आया कि क्षेत्र के अनेक तालाब, कुएँ और छोटे जलाशय तेजी से सूख रहे हैं। जिन जल स्रोतों में कभी वर्षभर पानी उपलब्ध रहता था, वे अब गर्मी की शुरुआत में ही सिकुड़ने लगे हैं। नर्मदा तट और आसपास के नदी-नालों का जल स्तर भी लगातार घट रहा है। इससे न केवल मानव जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पक्षियों, मछलियों, उभयचरों और अन्य जीवों के लिए भी संकट की स्थिति बन रही है।
अध्ययन के दौरान गौरैया, मैना,, नीलकंठ, रामचिरैया, फाख्ता, हरियल, शकरखोरा, बुलबुल और कोयल जैसे स्थानीय पक्षियों की संख्या में कमी दर्ज की गई। वहीं सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षियों जैसे साइबेरियन बत्तख, ब्राह्मणी बतख, पिंटेल बतख, कॉमन टील, गडवाल, नॉर्दर्न शोवेलर तथा बार-हेडेड गूज की उपस्थिति भी पहले की तुलना में कम दिखाई दी। जलाशयों और आर्द्रभूमि क्षेत्रों में अब पहले जैसी चहल-पहल दिखाई नहीं देती।
अध्ययन में सबसे अधिक चिंता का विषय कौवों और गिद्धों की लगातार घटती संख्या को बताया गया है। कभी ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले कौवे अब कई स्थानों पर बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार कौवे प्राकृतिक सफाई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, जो जैविक अपशिष्ट को समाप्त कर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में सहायता करते हैं। उनकी घटती संख्या पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत मानी जा रही है।
इसी प्रकार गिद्धों की संख्या में आई भारी गिरावट भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। एक समय मंडला क्षेत्र के जंगलों और पहाड़ियों में आसानी से दिखाई देने वाले गिद्ध अब दुर्लभ होते जा रहे हैं। गिद्ध मृत पशुओं को खाकर प्राकृतिक सफाई का कार्य करते हैं और संक्रामक बीमारियों के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक दवाओं, प्रदूषण, प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने तथा भोजन की कमी के कारण इनकी संख्या तेजी से घट रही है। गिद्धों की कमी से पर्यावरणीय स्वच्छता और प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला दोनों प्रभावित हो रही हैं।
मछलियों और जलीय जीवों की उपलब्धता में भी गिरावट देखी गई। सिंगुन, मांगुर, रोहू, कतला, मृगल, टेंगना, केकड़ा, झींगा, सीपी और घोंघा जैसे जीव अब पहले की तुलना में कम मिल रहे हैं। खेतों और प्राकृतिक क्षेत्रों में पाए जाने वाले मेंढक, मधुमक्खी, तितली, व्याध पतंग, धामन और गिरगिट जैसे जीवों की संख्या में भी कमी देखी गई है।
अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि अवैध खनन, अनियंत्रित कॉलोनियों का विस्तार, हरित क्षेत्रों का सिकुड़ना, पेड़ों की कटाई तथा कृषि में रासायनिक कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का अत्यधिक उपयोग पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते खनन के कारण मिट्टी का क्षरण हो रहा है और प्राकृतिक आवास नष्ट होते जा रहे हैं।
नवीन चौरसिया के अनुसार पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर कृषि, जल उपलब्धता, जलवायु और मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। पक्षियों की संख्या घटने से प्राकृतिक कीट नियंत्रण प्रभावित होता है। परागण करने वाले कीट-पतंगों की कमी कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है, जबकि जलीय जीवों की कमी जलाशयों की प्राकृतिक सफाई व्यवस्था को कमजोर करती है।
अध्ययन में पर्यावरण संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं। पुराने तालाबों, कुओं, नदी-नालों और छोटे बाँधों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी जाए। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देकर स्थानीय जल स्रोतों का पुनर्भरण किया जाए। नर्मदा तट और आसपास के क्षेत्रों में अवैध खनन पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक बताया गया है।
खेती में रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को कम कर जैविक खेती, गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट तथा प्राकृतिक कीट नियंत्रण उपायों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया है। गाँवों और विद्यालयों में नीम, पीपल, बरगद, जामुन, महुआ, करंज और इमली जैसे स्थानीय वृक्षों का रोपण बढ़ाने की आवश्यकता भी बताई गई है।
घरों, सार्वजनिक स्थलों और विद्यालयों में पक्षियों के लिए जलपात्र, दाना-पात्र और सुरक्षित घोंसलों की व्यवस्था करने का सुझाव भी दिया गया है। विशेष रूप से गौरैया, कौवा और अन्य स्थानीय पक्षियों के संरक्षण के लिए सामुदायिक स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता बताई गई है।
निष्कर्षतः यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में मंडला क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन और अधिक कमजोर हो सकता है। शिक्षक नवीन चौरसिया का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस का विषय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की आवश्यकता है। समाज, किसान, युवा और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से ही प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन सुरक्षित रखा जा सकता है।
