दैनिक रेवांचल टाइम्स | डिंडौरी
तेन्दूपत्ता संग्रहण में दिन-रात मेहनत करने वाले आदिवासी पारिश्रमिकों का भुगतान आज भी अधर में लटका हुआ है। मेंहदवानी विकासखंड की प्राथमिक लघु वनोपज समिति मेंहदवानी (364) एवं राई (365) के अंतर्गत आने वाले करीब 54 फड़ों के पारिश्रमिकों को अब तक मेहनताना नहीं मिलने से वन विभाग और संबंधित समितियों की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
जानकारी के अनुसार, तेन्दूपत्ता तुड़ाई का कार्य लगभग एक माह पहले ही समाप्त हो चुका है, लेकिन जिन मजदूरों ने जंगलों में कड़ी मेहनत कर शासन के लिए राजस्व जुटाया, उन्हें अब तक उनकी मजदूरी नहीं मिल सकी है। बरसात का मौसम शुरू हो चुका है और आदिवासी परिवार खेती के लिए खाद, बीज एवं अन्य आवश्यक सामग्री खरीदने के लिए भुगतान का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन जिम्मेदार विभाग की चुप्पी उनकी परेशानियां लगातार बढ़ा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन समय पर तेन्दूपत्ता संग्रहण करवा सकता है, तो मेहनतकश मजदूरों का भुगतान समय पर क्यों नहीं कर पा रहा? आखिर किसकी लापरवाही का खामियाजा गरीब आदिवासी परिवार भुगत रहे हैं?
डिंडौरी जिला संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत अनुसूचित क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति के लोग निवास करते हैं। यहां महुआ, हर्रा, बहेरा, आंवला, शहद, लाख, इमली, बेलगूदा सहित अनेक लघु वनोपज ग्रामीणों की आजीविका का आधार हैं। शासन आदिवासी कल्याण और आर्थिक उत्थान के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मेहनत का पैसा भी समय पर नहीं मिल पा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मजदूरी और लघु वनोपज का उचित मूल्य समय पर मिलता, तो क्षेत्र के गरीब परिवारों को रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन नहीं करना पड़ता। योजनाएं कागजों में सफल दिखाई जाती हैं, लेकिन उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक समय पर नहीं पहुंच पा रहा है।
अब सवाल यह है कि आखिर इन 54 फड़ों के पारिश्रमिकों का भुगतान कब होगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, या फिर आदिवासी मजदूरों को अपनी ही मेहनत की कमाई के लिए यूं ही दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
