पोल-खोल: मंडला में नौकरशाही के आगे बेबस पेसा कानून? चिरोडोंगरी में नवनिर्मित अस्पताल की सरकारी जमीन पर सुर परिवार पर कब्जे के आरोप

Revanchal
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पंचायत के आवेदन धूल फांकते रहे, आखिर किसके संरक्षण में रसूखदार पर रुकी है कार्रवाई?

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला। आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं और ग्राम पंचायतों को अधिकार देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंडला जिले के नैनपुर विकासखंड की ग्राम पंचायत चिरोडोंगरी में नवनिर्माण सरकारी अस्पताल की भूमि पर कथित सुर परिवार पर अतिक्रमण को लेकर पंचायत और ग्रामीणों द्वारा लगातार शिकायतें किए जाने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने के आरोपों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वही ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों का आरोप है कि सूर् परिवार द्वारा शासकीय अस्पताल परिसर की भूमि पर कब्जा कर लिया गया है। इसके कारण स्वीकृत पोस्टमार्टम भवन (मर्चुरी) और अस्पताल की बाउंड्री वॉल का निर्माण लंबे समय से अटका हुआ है। यदि यह आरोप सही हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीणों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं पर पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ग्राम पंचायत, सरपंच, सचिव और जनप्रतिनिधियों द्वारा नैनपुर के तहसीलदार, एसडीएम और कलेक्टर मंडला को कई बार आवेदन, प्रतिवेदन और जनसुनवाई के माध्यम से शिकायतें दी जा चुकी हैं, तो आखिर अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है?
यह मामला केवल एक अतिक्रमण का नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में लागू पेसा कानून की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
वही ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम सभा और पंचायत की आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। यदि पंचायत के प्रस्ताव और लगातार दिए गए आवेदन भी कार्रवाई नहीं करा पा रहे हैं, तो फिर पेसा कानून के अधिकार जमीनी स्तर पर कितने प्रभावी हैं?
क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण प्रभावशाली लोगों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हो पा रही। हालांकि इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है। ऐसे में यह आवश्यक है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और यदि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण पाया जाता है तो नियमानुसार उसे हटाकर लंबित निर्माण कार्य शीघ्र शुरू कराया जाए।


अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आदिवासी जिले में पेसा कानून केवल सरकारी फाइलों तक सीमित रह गया है? क्या ग्राम पंचायतों के अधिकार केवल कागजों में हैं? और यदि सरकारी अस्पताल की जमीन भी सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता आखिर न्याय की उम्मीद किससे करे? अब जिला प्रशासन को इन सवालों का जवाब अपनी कार्रवाई से देना होगा।
अब यह देखना बाकी है कि आखिरकार कब रसूखदार से सरकारी भूमि से क़ब्ज़ा वापस लेने के लिए कार्यवाही आगे बढ़ाते या फिर गठबंधन कर उस शासकीय भूमि में सुर परिवार को दान देकर इति श्री करते हैं।

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