जितेन्द्र अलबेला
मध्य प्रदेश की सियासत के गलियारों से छनकर आ रही खबरें इस समय बेहद चौंकाने वाली हैं। ऊपर से शांत और अनुशासित दिखने वाली भारतीय जनता पार्टी की डॉ. मोहन यादव सरकार के भीतर एक ऐसा तूफान पल रहा है, जो कभी भी ‘सुनामी’ का रूप ले सकता है।
अंदरूनी सूत्रों और सियासी मुखबिरों की मानें तो इस समय मोहन कैबिनेट के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
पेश है मध्य प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक हलचल पर एक विशेष और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट
‘फूलदान’ बनकर रह गए हैं मंत्री?
आमतौर पर भाजपा को एक बेहद अनुशासित पार्टी माना जाता है, जहां असंतोष की खबरें बाहर नहीं आतीं। लेकिन इस बार स्थिति बदली हुई है। सरकार के भीतर सबसे बड़ा असंतोष मंत्रियों के अधिकारों को लेकर है।
नाम के मंत्री, सीमित अधिकार
मंत्रियों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि वे सिर्फ पोर्टफोलियो (विभाग) संभाल रहे हैं, लेकिन उनके पास अपने ही विभाग में कोई नया प्रयोग (नवाचार) करने या स्वतंत्र रूप से फैसले लेने की आजादी नहीं है।
असंतोष का आंकड़ा राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कैबिनेट के करीब डेढ़ दर्जन (18) मंत्री इस समय अपने मुखिया की कार्यप्रणाली से नाराज चल रहे हैं।
कैबिनेट बैठकों पर लगा ‘ब्रेक’
इस अंदरूनी कलह का असर सरकार के कामकाज पर भी दिखने लगा है। पिछले दो हफ्तों से कैबिनेट की कोई बैठक नहीं होना इस बात का बड़ा संकेत माना जा रहा है। सियासी गलियारों में कयास हैं कि मंत्रियों की नाराजगी और बैठक में शामिल न होने की आशंका के चलते ही बैठकों को लगातार टाला जा रहा है।
दिल्ली दरबार तक पहुंची ‘विभीषणों’ की गवाही
सरकार के भीतर चल रही इस खींचतान से केंद्रीय नेतृत्व दिल्ली हाईकमान अनजान नहीं है। संगठन और सरकार के भीतर मौजूद कुछ ‘विभीषण’ पल-पल की जानकारी दिल्ली तक पहुंचा रहे हैं।
दिल्ली में हलचल एमपी बीजेपी के इस अप्रत्याशित संकट से दिल्ली का शीर्ष नेतृत्व भी हैरान और परेशान है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के हालिया दिल्ली दौरे भी इसी डैमेज कंट्रोल और केंद्रीय नेतृत्व के सामने अपनी बात रखने की कवायद का हिस्सा माने जा रहे हैं।
घी का काम कर गया ‘जमीन विवाद’
मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बीच कड़वाहट तो पहले से थी, लेकिन इसे हवा तब मिली जब मुख्यमंत्री पर कथित रूप से जमीन खरीदी के आरोप लगे।
मंत्रियों को आगे करने से नाराजगी इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री ने खुद सामने आकर सफाई देने के बजाय अपने मंत्रियों को ढाल बना दिया।
’मरता क्या न करता’ की स्थिति
मुख्यमंत्री के आदेश के बाद मंत्रियों को न चाहते हुए भी उनके बचाव में बयान जारी करने पड़े। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जबरन दिलवाए गए इन बयानों ने मंत्रियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई है, जिससे नाराजगी और बढ़ गई।
दिग्गज नेताओं की ‘खामोश’ सियासत
मोहन सरकार में शामिल भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के दिग्गज नेता भी इस समय अपनी राजनीतिक साख बचाने के संघर्ष में जुटे दिख रहे हैं:
नेता का नाम / वर्तमान स्थिति और रुख
कैलाश विजयवर्गीय उनकी कशमकश और कहानी किसी से छिपी नहीं है, वे अपनी लाइन अलग खींच रहे हैं।
प्रहलाद पटेल सरकार में रहते हुए भी अपनी राजनीतिक गरिमा और ‘इज्जत’ को बचाए रखने की कोशिश में हैं।
राकेश सिंह सरकार के कामकाज से ज्यादा फोकस अपनी सियासी साख को सुरक्षित रखने पर कर रहे हैं।
3 अगस्त के बाद क्या ‘बड़ा’ होने वाला है?
अब स्थिति यह हो चुकी है कि संगठन के बड़े पदाधिकारियों की मध्यस्थता और सुलह के प्रयास भी बेअसर साबित हो रहे हैं। मुखबिरों और राजनीतिक पंडितों का दावा है कि 3 अगस्त के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में कोई बहुत बड़ा उलटफेर या बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है।
क्या यह तूफान शांत हो जाएगा या फिर एमपी बीजेपी में सत्ता के समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे? आने वाले कुछ हफ्ते मध्य प्रदेश की सियासत के लिए बेहद क्रूशियल होने वाले हैं।
