ड्रग्स की खेप पकड़ी गई, चेहरे सामने आए… लेकिन कारोबार के असली चेहरे अब भी परदे में क्यों?

Revanchal
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जबलपुर में पुलिस ने एक बार फिर मादक पदार्थों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। क्राइम ब्रांच और चार थानों की संयुक्त टीम ने 2 महिलाओं सहित 7 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक 11 किलो 237 ग्राम गांजा, 30 किलो 631 ग्राम डोडा चूरा, 50 हजार रुपये नकद, एक ट्रक, एक कार, एक स्कूटी और 10 मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं। बरामद माल की कीमत करीब 7.61 लाख रुपये बताई गई है।


समाचार यहीं तक होता तो यह एक सामान्य पुलिस कार्रवाई की खबर होती। लेकिन खबर यहीं खत्म नहीं होती। खबर वहीं से शुरू होती है जहां पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति खत्म होती है।
जबलपुर में नशे का कारोबार कोई एक दिन में खड़ा नहीं हुआ है। यह कारोबार सड़कों पर खड़े छोटे विक्रेताओं से लेकर सप्लाई चेन, फाइनेंसर और संरक्षण देने वाले नेटवर्क तक फैला होता है। पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा है, वे इस नेटवर्क का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन क्या वे इसके सबसे बड़े खिलाड़ी हैं?


तिलवारा थाना क्षेत्र में होटल ऑर्बिट के पास पुलिस ने ललित कहार को पकड़ा। उसके पास से 6 किलो से अधिक गांजा बरामद हुआ। पुलिस का कहना है कि गांजा उड़ीसा से लाया गया था। सवाल है कि उड़ीसा से जबलपुर तक गांजा पहुंचाने की व्यवस्था किसने की? पैसे किसने लगाए? सप्लाई किसने सुनिश्चित की?


इसी तरह आईसीएमआर के पास एक युवक और युवती को स्कूटी पर गांजा ले जाते हुए पकड़ा गया। कटनी के रहने वाले ये दोनों आरोपी आखिर किसके लिए काम कर रहे थे? क्या वे खुद कारोबारी थे या किसी बड़े नेटवर्क की छोटी कड़ी?
कटंगी में ट्रक से 18 किलो से अधिक डोडा चूरा बरामद हुआ। जांच में कई नाम सामने आए। भेड़ाघाट में महिला आरोपी के घर से भी डोडा चूरा मिला। माढ़ोताल में घर और कार से डोडा चूरा, नकदी और मोबाइल बरामद हुए। हर कार्रवाई एक ही बात कहती है …यह कारोबार संगठित है, योजनाबद्ध है और इसमें केवल सामान ढोने वाले लोग ही शामिल नहीं हो सकते।


पुलिस ने कार्रवाई की, गिरफ्तारी की, जब्ती की। यह सराहनीय है। लेकिन जनता अब केवल गिरफ्तारी के आंकड़े नहीं देखना चाहती। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर इस कारोबार की जड़ तक पुलिस कब पहुंचेगी?
जबलपुर के लोगों को याद होगा कि गोहलपुर के लेम गार्डन क्षेत्र में भी नशे के कारोबार से जुड़े आरोपी अमजद का नाम सामने आया था। सवाल आज भी वहीं खड़ा है। अमजद जैसे लोगों के पीछे पैसा कौन लगा रहा था? कौन फाइनेंस कर रहा था इस पूरे नेटवर्क को? किसके संरक्षण में यह कारोबार फल-फूल रहा था?


क्या पुलिस के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं? या जवाब हैं, लेकिन उन जवाबों तक कार्रवाई नहीं पहुंच रही?
नशे के कारोबार में पकड़े जाने वाले अधिकांश लोग सप्लाई चेन की निचली परत में दिखाई देते हैं। मगर जो लोग पैसा लगाते हैं, जो माल खरीदवाते हैं, जो नेटवर्क खड़ा करते हैं और जो इस कारोबार से सबसे अधिक मुनाफा कमाते हैं, वे अक्सर जांच के दायरे से बाहर क्यों रह जाते हैं?


यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नशे का कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। यह युवाओं के भविष्य, परिवारों की तबाही और समाज के भीतर फैलते अपराध का मामला है।
पुलिस ने इस बार कई आरोपियों को पकड़ा है। लेकिन जब तक इस कारोबार के फाइनेंसर, निवेशक और कथित सरगना कानून के कटघरे में नहीं पहुंचते, तब तक हर कार्रवाई अधूरी दिखाई देगी।


सबसे बड़ा सवाल यही है … नशे का सामान बेचने वाले तो पकड़े जा रहे हैं, लेकिन नशे के कारोबार में पैसा लगाने वाले लोग कौन हैं और उन्हें आखिर क्यों बचाया जा रहा है? गोहलपुर लेम गार्डन में पकड़े गए आरोपी अमजद को फाइनेंस कौन करता था? यदि पुलिस के पास इस नेटवर्क की जानकारी है, तो फिर उन नामों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? और यदि जानकारी नहीं है, तो इतने बड़े नेटवर्क की जड़ तक जांच कब पहुंचेगी?
मुहम्मद अनवार बाबू

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