स्वास्तिक हॉस्पिटल पर रेवांचल टाइम्स की दस्तावेजी रिपोर्ट के बाद पत्रकारिता पर दबाव की कोशिश

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जब सच्चाई दस्तावेजों में मिलती है, तो झूठ लेता है नोटिस का सहारा
ॅ सवाल पूछना अपराध नहीं… अपराध है, जवाब न देना।
ॅ सच की आवाज दबाई जा सकती है, पर झूठ की तरह मिटाई नहीं जा सकती।
ॅ कानून की किताबें भी कहती हैं ….. दस्तावेज बोलते हैं, डर नहीं।
ॅ जनहित में लिखा गया सच, किसी की मानहानि नहीं ….. सिस्टम का आईना होता है।
ॅ पत्रकारिता अब खतरे में नहीं, खतरे में है वो सिस्टम जो सच से डरता है।
ॅ जब नोटिस डराने लगें, तो समझिए खबर ने निशाना सही साधा है।
ॅ जब अखबार मैनेज नहीं होता… तब भेजे जाते हैं धमकी भरे नोटिस
ॅ स्वास्तिक हॉस्पिटल बनाम पत्रकारिता : सच्चाई पर कानूनी हमला
दैनिक रेवांचल टाइम्स, जबलपुर। कभी-कभी सन्नाटा भी बहुत कुछ कह जाता है। जब एक अखबार सरकारी दस्तावेजों की रोशनी में सच्चाई दिखा देता है, तो सन्नाटा टूटने लगता है … और तब शुरू होती है धमकी, डराने और खरीदने चुप कराने की राजनीति। जबलपुर में स्वास्तिक मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की कहानी कुछ ऐसी ही है। समाचार पत्र ने जब दस्तावेजी रिपोर्टों के जरिए नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वाली सच्चाई जनता के सामने रखी, तो अस्पताल प्रबंधन ने जवाब में सच्चाई नहीं, नोटिस भेजा।
सच छापने की सजा … एक करोड़ का नोटिस
अखबार ने अपनी रिपोर्टों में सवाल उठाया था … क्या गलत खसरा नंबर दिखाकर अस्पताल ने नक्शा स्वीकृत कराया? नगर निगम ने अब तक कोई ठडउ क्यों नहीं दी? क्या अस्पताल में फायर सेफ्टी, पार्किंग और प्रदूषण के नियमों का पालन हुआ? इन सवालों के जवाब में प्रशासन ने जो दस्तावेज दिए, वे साफ कहते हैं … नगर निगम भवन शाखा द्वारा उक्त अस्पताल को संचालन हेतु किसी प्रकार की ठडउ जारी नहीं की गई है। (पत्र क्रमांक भ.शा./2025-26/642 दिनांक 22.09.2025) यानि समाचार पत्र की रिपोर्टें सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित थीं। लेकिन अब, इन्हीं रिपोर्टों को मानहानि कहकर अस्पताल ने ?1 करोड़ का नोटिस भेजा है। कानूनी भाषा में लिखा नोटिस दरअसल डराने की कोशिश है … देखो, अगर सच्चाई लिखोगे, तो हम अदालत में घसीट लेंगे।
जब सच्चाई से डर लगता है
नोटिस भेजने वाले शायद भूल गए कि पत्रकारिता कोई पीआर एजेंसी नहीं है। यह सत्ता और संस्थानों से सवाल पूछने की जनता की आवाज है।
अब हम कहते है डंके की चोट पर …
जो बोलता है, वही लोकतंत्र है। और जब बोलने वाला अखबार बोलता है, तो उसके खिलाफ नोटिस बोलते हैं।
प्रशासन की चुप्पी और सिस्टम की सड़ांध
वही जब स्वास्तिक हॉस्पिटल पर पहले भी टाउन एंड कंट्री विभाग और नगर निगम नोटिस जारी कर चुके हैं। फिर भी संचालन किसके संरक्षण से है जारी । अब जब समाचार पत्र ने फाइलों में दबी सच्चाई निकाली, तब तब सिस्टम मौन नजर आया, और दुसरी तरफ अस्पताल प्रबंधन आक्रामक।
क्या यही है ईमानदार प्रशासन का चेहरा?
कानूनी ढाल के पीछे छिपी बौखलाहट दिलचस्प बात यह है कि अस्पताल के नोटिस में किसी दस्तावेज को गलत नहीं कहा गया। न ही यह बताया गया कि फळक या नगर निगम के जवाब झूठे थे। यानि जब तथ्य झुठलाए नहीं जा सकते, तो डर पैदा किया जाता है। सवाल उठाने वालों को कोर्ट-कचहरी में उलझाने की कोशिश होती है।
पत्रकार संगठनों की आवाज
भारतीय पत्रकार संघ और कई पत्रकार संघों ने इस नोटिस को प्रेस की आजादी पर हमला बताया। वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि … जनहित की जानकारी सार्वजनिक करना अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र का पहला फर्ज़ है। और पत्रकारिता शासन और जनता के बीच पारदर्शिता लाने का कार्य करती हैं पहले प्रलोभन फिर धमकी और फिर नोटिस भेजकर पत्रकारिता को डराना खतरनाक परंपरा की शुरूआत है।
कानूनी नजरिया
वही कानूनी विशेषज्ञों ने साफ कहा … अगर रिपोर्ट सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है, तो वह मानहानि नहीं, बल्कि जनहित प्रकटीकरण है। सुप्रीम कोर्ट का फ. फं्नँङ्मस्रं’ ५२ र३ं३ी ङ्मा ळें्र’ ठं४ि (1994) फैसला भी यही कहता है। सरकारी अभिलेखों पर आधारित रिपोर्ट को मानहानि नहीं माना जा सकता। समाचार पत्र का रुख … झुकेंगे नहीं समाचार पत्र ने स्पष्ट किया है … हमने किसी से दुश्मनी नहीं निभाई, सिर्फ सच्चाई शासन और जनता के बीच लाई है। जब अखबार मैनेज नहीं होता, तब नोटिस भेजे जाते हैं। पर हम न दबेंगे, न रुकेंगे। जनता के मन में उठते सवाल अगर सब कुछ वैध था, तो नगर निगम ने ठडउ क्यों नहीं दी? बड़ा सवाल गलत खसरा नंबर से नक्शा कैसे पास हुआ? क्या प्रशासन प्रभावशाली संस्थानों के दबाव में है?
अंत में…
यह मामला सिर्फ एक अस्पताल या एक अखबार का नहीं … यह सवाल है कि क्या सच्चाई जनता और शासन तक पहुँचना अब अपराध है? क्या अब पत्रकार को कलम से नहीं, कोर्ट के नोटिस से चुप कराया जाएगा? समाचार पत्र ने दस्तावेजों के साथ जवाब दिया है … पर सच दबेगा नहीं। हम सच के साथ हमेशा खड़े हैं। और झूठ, चाहे जितना भी परेशान करे, वह आखिरकार सच्चाई सामने आ ही है … क्योंकि जब अखबार मैनेज नहीं होता… तब ही लोकतंत्र को बचता है।

क्या कहता है कानून….
अब जरा अदालत की ओर रुख करते हैं, जहाँ शब्दों से ज्यादा मायने रखते हैं दस्तावेज।
कानून साफ कहता है …. अगर कोई रिपोर्ट सरकारी रिकॉर्ड, फळक या सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित है, तो उसे मानहानि नहीं कहा जा सकता। यह जनहित प्रकटीकरण (ढ४ु’्रू कल्ल३ी१ी२३ ऊ्र२ू’ङ्म२४१ी) है …. जिसे संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ं) यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संरक्षण देता है। भारत के कई ऐतिहासिक फैसले इस बात को मजबूत करते हैं:

  1. फ. फं्नँङ्मस्रं’ ५२ र३ं३ी ङ्मा ळें्र’ ठं४ि (1994)
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा …. यदि कोई प्रकाशन सार्वजनिक रेकॉर्ड या सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है, तो उसे रोका नहीं जा सकता, न ही उसे मानहानि कहा जा सकता है। यह वही फैसला है जिसने पत्रकारिता को एक संवैधानिक कवच दिया …. सच दिखाओ, लेकिन प्रमाण के साथ।
  2. रँ१ी८ं र्रल्लॅँं’ ५२ वल्ल्रङ्मल्ल ङ्मा कल्ल्िरं (2015)
    इस ऐतिहासिक मामले में अदालत ने कळ अू३ की धारा 66अ को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा …. सिर्फ इसलिए कि कोई बात किसी को पसंद नहीं आई, उसे अपराध नहीं कहा जा सकता। यानी, अभिव्यक्ति का अधिकार लोकतंत्र की रीढ़ है, और इसे कानूनी डर से नहीं कुचला जा सकता।
  3. कल्ल्िरंल्ल ए७स्र१ी२२ ठी६२स्रंस्री१२ ५२ वल्ल्रङ्मल्ल ङ्मा कल्ल्िरं (1985)
    सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा …. प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, इसे अप्रत्यक्ष दबाव या आर्थिक नियंत्रण से सीमित नहीं किया जा सकता। इन फैसलों की रोशनी में यह साफ है कि अगर समाचार पत्र ने जो लिखा, वह सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित है, तो यह मानहानि नहीं, बल्कि जनहित पत्रकारिता है। कानून भी यही कहता है …. शासकीय कार्यालयों से निकाले दस्तावेज से निकला सच कभी झूठ नहीं ठहराया जा सकता।

अब जरा इस कहानी को गौर से सुनिए…
क्योंकि यह सिर्फ एक अस्पताल की फाइलों में छिपी गड़बड़ी की दास्तान नहीं, बल्कि उस सिस्टम की आत्मा पर लगी परतें हैं जो जनहित की बातें तो करता है, मगर जनसत्य से डरता है। जबलपुर का स्वास्तिक मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर … नाम बड़ा, इमारत चमकदार, लेकिन जमीन के नीचे दस्तावेजों का काला सच। जब समाचार पत्र के रिपोर्टर ने जब सरकारी रिकॉर्ड, फळक जवाब और राजस्व नक्शों की भाषा में यह सच जनता के सामने रखा, तो हकीकत यह निकली कि अस्पताल के नक्शे में खसरा नंबर कुछ और, जमीन कुछ और। साथ ही नगर निगम ने कहा … हमने ठडउ नहीं दी, और जब ये रिपोर्टें छपीं, तो जवाब में आया … एक करोड़ का नोटिस। यानी अब दौर ऐसा है कि सच्चाई पर बहस नहीं होती, उस पर कानूनी हमला होता है। जिस पत्रकार ने दस्तावेज के आधार पर खबरे जनता और शासन को दिखाए, तो अस्पताल प्रबंधन ने अपना बचाव करते हुए पहले लोगो से फोन लगवा फिर प्रलोभन दिया और उसके बाद शुरू हुआ धमकी देने का खेल और अब एक नोटिस के माध्यम उसे मानहानि का दोषी बताया जा रहा है। और यह सब उस दौर में, जब लोकतंत्र के चौथे खंभे की नींव पहले ही कमजोर कर दी गई है। यह कहानी पत्रकारिता बनाम प्रभावशाली संस्थानों की टकराहट की है। जहाँ स्याही अभी सूखी नहीं, पर नोटिस पहले ही भेज दिया गया है। जहाँ फळक का सच अदालत की दलीलों से टकरा रहा है। और जहाँ हर धमकी के पीछे एक ही आवाज गूंजती है …

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