धधकते खेत, सोता प्रशासनखुलेआम नरवाई दहन जिम्मेदार कोमे में

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला जिले में खेत इन दिनों अन्न नहीं, आग उगल रहे हैं। शासन के सख्त आदेशों के बावजूद किसानों द्वारा खुलेआम नरवाई जलाई जा रही है, जबकि जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बना बैठा है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि खेतों से उठता धुआं अब हवा को जहरीला बना रहा है और सड़कें हादसों के मुहाने पर पहुंच गई हैं। बम्हनी ढेंको क्षेत्र में तेज हवा और तूफान के बीच नरवाई की आग बेकाबू होकर करीब 10 एकड़ तक फैल गई, जिससे पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।


मंडला जिले में प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
जिले भर में खेतों में नरवाई जलाने का सिलसिला तेज हो चुका है, लेकिन जिम्मेदार विभाग तमाशबीन बने हुए हैं। शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी हालत में नरवाई नहीं जलाई जाए, अन्यथा सख्त कार्रवाई होगी, मगर जमीनी हकीकत इसके उलट दिखाई दे रही है। खेतों में दिन-रात आग धधक रही है और कहीं कोई प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आ रही।


मंडला-नैनपुर रोड के किनारे कई खेतों का जायजा लिया, जहां नरवाई पूरी तरह जलाकर राख कर दी गई थी। देर रात खेतों में आग लगाने का खेल खुलेआम जारी है, ताकि प्रशासनिक कार्रवाई से बचा जा सके। यही स्थिति सेमरखापा क्षेत्र में भी देखने को मिली, जहां खेतों में फसल अवशेषों को आग के हवाले किया जा रहा है।


सोमवार को बम्हनी ढेंको क्षेत्र में स्थिति और भयावह हो गई। सड़क के दोनों ओर खेतों में नरवाई जलाई गई थी, तभी तेज हवा और तूफान के कारण आग अचानक बेकाबू हो गई और लगभग 10 एकड़ क्षेत्र तक फैल गई। खेतों से उठते घने धुएं के कारण सड़क पर दृश्यता लगभग शून्य हो गई, जिससे राहगीरों को सड़क तक दिखाई देना बंद हो गया और बड़ा हादसा टलते-टलते बचा।


नरवाई जलाने से केवल पराली नहीं जलती, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी खत्म होती है। जमीन में मौजूद उपयोगी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे भविष्य की फसल उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। इसके साथ ही उठता जहरीला धुआं वातावरण को प्रदूषित कर रहा है, लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है और सड़क किनारे धुएं की चादर दुर्घटनाओं को न्योता दे रही है।


सबसे बड़ा सवाल कृषि विभाग की भूमिका पर खड़ा हो रहा है। किसानों को नरवाई जलाने के दुष्परिणाम, वैकल्पिक उपाय और मृदा संरक्षण की जानकारी देने में विभाग पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। जागरूकता के अभाव में किसान आज भी पुरानी और खतरनाक पद्धति अपनाने को मजबूर हैं।

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