जांच जारी, घोटालेबाज अधिकारी पर मेहरबानी जारी!
डिंडोरी के बीज घोटाले से लेकर मंडला तक… किसानों की योजनाओं को लूटने वालों पर आखिर किसका हाथ?
आदिवासी अंचलों के किसानों के नाम पर आने वाली योजनाएं आखिर किसकी तिजोरी भर रही हैं? डिंडोरी जिले में करोड़ों रुपये के कथित बीज वितरण घोटाले की जांच में सामने आए चौंकाने वाले खुलासों ने किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभागीय जांच में तत्कालीन प्रभारी उपसंचालक अश्वनी कुमार झारिया की भूमिका संदिग्ध पाई गई, अधीनस्थ अधिकारियों ने दबाव में फर्जी सूची बनवाने की बात स्वीकार कर ली, आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) जबलपुर तक मामले की जांच पहुंच गई, तब भी आखिर ऐसे अधिकारी को मंडला जिले में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर किसानों की योजनाओं की कमान क्यों सौंप दी गई?
दैनिक रेवांचल टाइम्स — डिंडोरी जिले के वर्ष 2021-22 के टरफा योजना अंतर्गत चना एवं मसूर बीज वितरण मामले में सामने आए दस्तावेज अब केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार, कूटरचना और शासन को करोड़ों की चपत लगाने की कहानी बयान कर रहे हैं।
“बीज आया ही नहीं, लेकिन कागजों में बांट दिया गया”
आरटीआई कार्यकर्ता रूपभान पारासर द्वारा की गई शिकायत में आरोप लगाया गया था कि किसानों को वास्तविक रूप से बीज वितरण नहीं किया गया, बल्कि फर्जी किसानों की सूची बनाकर शासन से प्राप्त बीज का कागजी वितरण दिखा दिया गया। शिकायत के बाद विभागीय जांच बैठाई गई, जिसमें कई अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए गए।
जांच के दौरान वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी अमरपुर श्री एम.एस. परस्ते ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि:
विकासखंड अमरपुर के लिए 837 क्विंटल चना बीज और 200.20 क्विंटल मसूर बीज दर्ज था।
वास्तविक वितरण कम हुआ, लेकिन रिकॉर्ड में भारी मात्रा में वितरण दर्शाया गया।
करीब 353.25 क्विंटल चना बीज का वास्तविक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
471 किसानों की सूची फर्जी तरीके से तैयार कराई गई।
सबसे सनसनीखेज खुलासा यह रहा कि कथित तौर पर तत्कालीन प्रभारी उपसंचालक अश्वनी कुमार झारिया ने अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव बनाकर फर्जी सूची तैयार करवाई।
कथन में साफ कहा गया कि —
“अगर सूची नहीं बनाई तो नौकरी खा जाऊंगा…”
यानी सरकारी नौकरी बचाने के लिए कर्मचारियों से कागजों में किसानों को बीज बांटने का खेल कराया गया।
शासन की शर्तें और नियम ताक पर!
टरफा योजना के नियमों के अनुसार:
बीज वितरण केवल पात्र किसानों को किया जाना था।
प्रत्येक किसान से प्राप्ति हस्ताक्षर लेना अनिवार्य था। स्टॉक पंजी, वितरण पंजी और भुगतान रिकॉर्ड का मिलान आवश्यक था।
कृषक अंश राशि का विधिवत रिकॉर्ड रखा जाना था।
वितरण का भौतिक सत्यापन किया जाना था। लेकिन जांच में सामने आया कि:
अनेक किसानों के हस्ताक्षर संदिग्ध पाए गए। कई किसानों को योजना की जानकारी तक नहीं थी। रिकॉर्ड और वास्तविक वितरण में भारी अंतर था।
स्टॉक पंजी और वितरण सूची मेल नहीं खा रही थी। फर्जी किसानों के नाम जोड़कर शासन को नुकसान पहुंचाया गया। यदि ये आरोप पूरी तरह सिद्ध होते हैं, तो मामला केवल विभागीय अनियमितता नहीं बल्कि आपराधिक षड्यंत्र, शासकीय राशि के गबन और दस्तावेजों में कूटरचना का बनता है।
EOW जांच में फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) की भूमिका को लेकर उठ रहा है। सूत्रों के अनुसार मामला EOW जबलपुर तक पहुंचा, जांच हुई, दस्तावेज खंगाले गए, विभागीय जांच में गंभीर विसंगतियां भी सामने आईं, लेकिन इसके बावजूद आज तक बड़ी कार्रवाई जमीन पर दिखाई नहीं दी।
आखिर क्यों?
क्या जांच केवल फाइलों तक सीमित है?
क्या प्रभावशाली अधिकारियों को संरक्षण मिल रहा है? क्या किसानों के नाम पर हुए करोड़ों के घोटाले में बड़े अधिकारियों की भूमिका दबाई जा रही है? यदि जांच जारी है तो आरोपी अधिकारी अब भी महत्वपूर्ण पदों पर क्यों बैठे हैं?
यह सवाल अब केवल डिंडोरी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि मंडला जिले तक पहुंच चुका है।
डिंडोरी से मंडला तक… क्या जारी है वही खेल?
चौंकाने वाली बात यह है कि जिन अश्वनी कुमार झारिया पर डिंडोरी में गंभीर आरोप लगे, वही अधिकारी आज मंडला जिले में प्रभारी उपसंचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास के पद पर बैठकर योजनाओं की कमान संभाल रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि:
विभाग में फर्जी बिलों का खेल जारी है।
चहेते लोगों को लाभ पहुंचाया जा रहा है।
योजनाओं में पारदर्शिता नहीं है।
किसानों को समय पर खाद-बीज नहीं मिल रहा। विभागीय संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है।
वही किसानों का कहना है कि योजनाओं का लाभ खेत तक कम और फाइलों तक ज्यादा पहुंच रहा है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में आदिवासी किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधि भी इस मामले में मौन नजर आ रहे हैं। जब विभागीय जांच में अधिकारियों के बयान ही फर्जीवाड़े की पुष्टि कर रहे हैं, तब आखिर कार्रवाई की मांग जोरदार तरीके से क्यों नहीं उठ रही?
क्या किसानों का मुद्दा केवल चुनावी भाषणों तक सीमित है?
प्रशासन से उठ रही ये बड़ी मांगें
अब जिले के किसान और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि:
पूरे बीज वितरण घोटाले की न्यायिक जांच कराई जाए।
EOW जांच की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाए।
कथित दोषी अधिकारियों को तत्काल पद से हटाया जाए। फर्जी किसानों की सूची सार्वजनिक की जाए। शासन को हुए नुकसान की रिकवरी की जाए।
मंडला जिले में वर्तमान कार्यकाल की भी स्वतंत्र जांच कराई जाए।
किसानों का दर्द — योजनाएं कागजों में, खेत खाली
एक तरफ आदिवासी किसान महंगे बीज, खाद और सिंचाई संकट से जूझ रहा है, दूसरी ओर उन्हीं किसानों के नाम पर योजनाओं में भ्रष्टाचार का खेल खेला जा रहा है। जिन योजनाओं का उद्देश्य खेती बचाना था, वे ही अब भ्रष्टाचारियों के लिए कमाई का जरिया बनती दिखाई दे रही हैं।
यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो किसानों का सरकारी योजनाओं से विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा। अब देखना यह है कि शासन और जांच एजेंसियां इस मामले में वास्तव में कार्रवाई करती हैं या फिर किसानों के नाम पर हुआ यह कथित घोटाला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
