दैनिक रेवाँचल टाईम्स – मण्डला। जब किसी अधिकारी कर्मचारी पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) जैसी जांच एजेंसी एफआईआर दर्ज कर दे, तो सामान्यतः अपेक्षा की जाती है कि उसे जांच पूरी होने तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा जाएगा। लेकिन मध्यप्रदेश में तस्वीर कुछ और अलग ही दिखाई दे रही है। जिस अधिकारी पर सरकारी धन की लूट और किसानो को मिलने वाली योजना में आख बंद करके भ्रष्टाचार के आरोप लगे और जिसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, उसे जिम्मेदारी से हटाने के बजाय नए जिले का प्रभार सौंप दिया गया।

अशवनी झारिया, प्रभारी, उपसंचालक कृषि मण्डला
और फिर लूटने भ्रष्टाचार गबन घोटाले की खुली छूट देते हुए मंडला जिले के प्रभारी उपसंचालक के पद पर आसीन कर के भ्रष्टों का सीना चौड़ा किया जा रहा है और अब वह उसी चौड़े सीने के बल पर डिंडोरी जिले में किए गए भ्रष्टाचार को मंडला जिले में और तेजी अंजाम तक लेजाने में कोई कसर नहीं छोड़ा जा रहा है और सभी नियम कानून को शिथिल करते हुए तेजी से अबेध वसूली फर्जी बिलों में खरीदी फर्जी किसानो की सूची तैयार कर जारी है
किसानो और सरकार की आख में धूल झोकने का काम इन भ्रष्ट अधिकारियों को यह अच्छे से पता चल गया है की पैसा कमाओ और जब पकड़े जाओ तो उसी पैसो का उपयोग कर बच कर निकल जाओ रही बात की तो जाचे चलती रहती हैं लोग रिटायर हो जाते है और मर तक जाते है पर जाचे चलती रहती हैं !
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि जब मीडिया ने जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगना चाहा तो कोई दिल्ली की बैठक में व्यस्त मिला, कोई फ्लाइट में होने का हवाला देता रहा और कोई दूसरे अधिकारी से बात करने की सलाह देता नजर आया। सवाल यह नहीं है कि अधिकारी कहां हैं, सवाल यह है कि जवाब कौन देगा?
मण्डला कृषि विभाग में पदस्थ प्रभारी उप संचालक अश्वनी झारिया पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) जबलपुर द्वारा एफआईआर दर्ज किए जाने के बावजूद उन्हें जिम्मेदारी से हटाने के बजाय उच्च पद का प्रभार देकर मण्डला भेज दिया गया। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन आरोपों के आधार पर जांच एजेंसी ने मामला दर्ज किया, उसी तरह की शिकायतें अब मण्डला जिले से भी सामने आने लगी हैं।
वही जब रेवांचल टाइम्स ने इस मामले में कृषि विभाग के डायरेक्टर उमाशंकर भार्गव, विभागीय सचिव निशांत वरवड़े और जिला प्रशासन से जवाब जानने का प्रयास किया, तो कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। कोई दिल्ली की बैठक में व्यस्त बताया गया, कोई फ्लाइट में होने की बात कहता रहा, जबकि कलेक्टर राहुल नामदेव धोटे से चर्चा की बात कही गई। लेकिन मूल प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—आखिर एफआईआर दर्ज होने के बाद भी संबंधित अधिकारी को संरक्षण किसके निर्देश पर मिला?
यह स्थिति केवल एक अधिकारी या एक विभाग तक सीमित नहीं है। इससे प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि भ्रष्टाचार के आरोपों और दर्ज एफआईआर के बाद भी अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं, तो इससे जांच एजेंसियों की कार्रवाई और शासन की भ्रष्टाचार विरोधी प्रतिबद्धता दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जनप्रतिनिधियों द्वारा लिखे गए पत्र, शिकायतें और जनता की आवाज भी व्यवस्था के गलियारों में अनसुनी होती दिखाई दे रही है। यदि सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाओं और आपत्तियों का भी कोई महत्व नहीं रह गया है, तो विपक्ष के विरोध प्रदर्शन और पुतला दहन से परिणाम की उम्मीद करना कठिन है।
जनता यह जानना चाहती है कि आखिर प्रशासनिक जवाबदेही किसके प्रति है? यदि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारियों को संरक्षण मिलता रहेगा और सवाल पूछने वालों को जवाब नहीं मिलेगा, तो शासन की पारदर्शिता पर विश्वास कमजोर होगा। लोकतंत्र में सबसे बड़ा उत्तरदायित्व जनता के प्रति होता है, न कि पद और प्रभाव के प्रति। इसलिए सरकार और विभागीय अधिकारियों को इस मामले में स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब देना चाहिए, ताकि जनता का भरोसा कायम रह सके।
