जंगल सुरक्षित या कब्रगाह बनता संरक्षण? बाघ का पूरा परिवार की हुई मौत

दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला/ मंडला जिले में स्थित विश्व प्रशिद्ध कान्हा नेशनल पार्क, जो कभी बाघों की दहाड़ और जैव विविधता के लिए दुनिया भर में पहचान रखता था, आज सवालों के घेरे में है। लगातार हो रही बाघों (जिन्हें अक्सर जंगल का “राजा” कहा जाता है) की मौत ने पूरे संरक्षण सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
और उनके ऊपर खर्च होने वाले वजट पर बडा सवाल खड़ा हो रहा है और प्रबंधन आख़िर कहा है और कैसे बाघो का संरक्षण और सुरक्षा है जब नेशनल पार्क में बाघ ही सुरक्षित नही तो कौन है सुरक्षित अब धीरे धीरे प्रबंधन को पोल परत दर परत बाघो की मौत से खुलती नजर रही है और इस मौत में कान्हा नेशनल पार्क के जिमेदारो का बस एक ही रटा रटाया जबाब की वर्चव की लड़ाई पर असली बात सामने नही आ रही है कि आखिर कैसे आये दिन बाघो और शावक अपनी वर्चव की लड़ाई लड़ है जो सीधे उनकी मौत ही उनका आजम हो रहा है
मौतों का सिलसिला: संयोग या लापरवाही कब तक चलेगा मौत का सिलसिला?
पिछले कुछ समय से शावकों और एक बाघों की मौत ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर गलती कहां हो रही है। हर घटना के बाद वही प्रक्रिया—पोस्टमार्टम, रिपोर्ट, प्रेस रिलीज… और फिर सन्नाटा।
क्या यह सिर्फ प्राकृतिक घटनाएं हैं?
या फिर कहीं न कहीं निगरानी, प्रबंधन और जवाबदेही में कमी है?
करोड़ों का बजट, लेकिन नतीजा शून्य?
वन्यजीव संरक्षण के नाम पर हर साल शासन और विदेशी लाखों करोड़ों रुपए फंड पर खर्च कहाँ किए जाते है, कान्हा प्रबंधन के जिम्मेदार अपनी अपनी सुख सुविधाएं में व्यस्त और मस्त
निगरानी सुरक्षा
चिकित्सा संरक्षण योजनाएं
लेकिन सवाल यह है कि जब इतने संसाधन लगाए जा रहे हैं, तो फिर मौतों का सिलसिला क्यों नहीं रुक रहा?
क्या यह पैसा सिर्फ कागजों में ही “संरक्षण” कर रहा है?
आखिर कहाँ सो रहा कान्हा प्रबंधन और जिम्मेदार कौन?
हर बार जिम्मेदार विभाग की ओर से एक प्रेस नोट जारी होता है—
“स्थिति नियंत्रण में है… कारणों की जांच की जा रही है…”
लेकिन असली सवाल वहीं का वहीं—
क्या किसी की जवाबदेही तय हुई?
क्या किसी अधिकारी पर कार्रवाई हुई?
क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस कदम उठाए गए?
कान्हा का हाल अब कुछ ऐसा लगता है—
“बाघ बचाओ परियोजना: रिपोर्ट में सफल, जमीन पर असफल!”
और शायद जंगल के “राजा” भी अब यही सोचते होंगे—
“हमें बचाने के लिए इतना तामझाम मत करो… बस हमें हमारे हाल पर छोड़ दो!”
प्रेस रिलीज बनाम जमीनी हकीकत
हर मौत के बाद विभाग सक्रिय नजर आता है— कैमरे, बयान, रिपोर्ट… सब कुछ। लेकिन जैसे ही खबर ठंडी पड़ती है, जिम्मेदारी भी ठंडी हो जाती है।
ऐसा लगता है जैसे असली काम जंगल में नहीं, बल्कि फाइलों और प्रेस नोट में हो रहा है।
क्या खतरे में है जंगल के राजा का भविष्य?
अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब बाघ सिर्फ किताबों और पोस्टरों में ही नजर आएंगे।
क्योंकि संरक्षण सिर्फ योजना बनाने से नहीं, उसे जमीन पर लागू करने से होता है।
अब जरूरी है जवाबदेही
हर मौत की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय
जमीनी स्तर पर निगरानी मजबूत
बजट के उपयोग का सार्वजनिक लेखा-जोखा
आज का सवाल
कान्हा के जंगल आज भी खड़े हैं, बाघ भी हैं…
लेकिन क्या उनका भविष्य सुरक्षित है?
या फिर “जंगल का राजा” सिर्फ कागजों में ही जिंदा रह जाएगा—
और जमीन पर रह जाएगी सिर्फ प्रेस रिलीज और अधूरी जिम्मेदारियां?
लगातार हो रही शेरों की मौत न सिर्फ अब उनके अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिया हे बल्कि आदिवासी बैगा और जंगल में रहने वाले अन्य लोगों के जीवकोपार्जन पर भी आने वाले दिनों में प्रभाव पड़ेगा।
