“आदिवासी जिला है… यहां सब जायज है!”
दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला/आदिवासी बाहुल्य मंडला जिला, जो अपनी प्राकृतिक संपदा और आदिवासी पहचान के लिए जाना जाता है, आज उसी पहचान के नाम पर खुलेआम लूटा जा रहा है। यहां नियम-कानून किताबों में जरूर लिखे हैं, लेकिन जमीन पर उनका अस्तित्व ढूंढना किसी चुनौती से कम नहीं।
जिम्मेदार विभाग: नींद या समझौता?
जिले में अवैध खनन का खेल कोई नया नहीं है, लेकिन जिस बेखौफ अंदाज में यह चल रहा है, वह कई सवाल खड़े करता है।
क्या संबंधित विभाग को इसकी जानकारी नहीं है?
या फिर जानकारी होते हुए भी “सब सेट” है?
क्योंकि हालात तो यही बयां करते हैं कि या तो अधिकारी गहरी नींद में हैं, और अगर कभी जागते भी हैं तो छोटी-मोटी कार्रवाई कर फिर से सो जाते हैं।
भोले कृषिकों और किसानो को बनाया जा रहा शिकार
सूत्रों के अनुसार, बिछिया तहसील मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर गुंडली गांव में एक आदिवासी की निजी जमीन पर “तालाब निर्माण” के नाम पर बड़े पैमाने पर अवैध खनन किया जा रहा है।
क्रेशर मालिक पहले भोले-भाले ग्रामीणों को लालच देते हैं—
“हम आपके खेत में मुफ्त में तालाब बना देंगे…”
लेकिन हकीकत यह है कि तालाब के नाम पर जमीन को गहराई तक खोदकर पत्थर और खनिज निकाले जाते हैं, और बाद में वही जमीन बड़े-बड़े खतरनाक गड्ढों में बदल जाती है।
क्या कहते है नियम.?
खनन से जुड़े नियम साफ हैं—
बिना वैध अनुमति (लीज/परमिट) खनन पूरी तरह अवैध है
पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) जरूरी है
खनन की सीमा और गहराई तय होती है
स्थानीय प्रशासन और खनन विभाग की निगरानी अनिवार्य है
भूमि स्वामी की सहमति के साथ-साथ कानूनी प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है
लेकिन मंडला में ये नियम शायद सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं।
शासन को करोड़ों का नुकसान
अवैध खनन के इस खेल में सबसे बड़ा नुकसान शासन को हो रहा है।
जहां एक ओर क्रेशर मालिक करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं सरकार को मिलने वाला राजस्व सीधे-सीधे “गायब” हो रहा है।
“लूट सको तो लूटो” की तर्ज पर खुली लूट
जिले की स्थिति देखकर ऐसा लगता है जैसे यहां कोई नियंत्रण ही नहीं है।
मानो एक अनकहा संदेश चल रहा हो—
“जिसको जितना लूटना है, लूट लो… यहां कोई पूछने वाला नहीं!”
और जिम्मेदार दफ्तरों का हाल तो कुछ ऐसा लगता है—
“हम फाइलों में सब ठीक दिखा देंगे, बाकी जमीन पर क्या हो रहा है, उससे हमें क्या?”
भविष्य के लिए खतरा
तालाब के नाम पर किए जा रहे इस अवैध खनन का असर आने वाले समय में बेहद खतरनाक हो सकता है—
गहरे गड्ढों से हादसों का खतरा
जमीन की उपजाऊ क्षमता खत्म
जल स्तर पर नकारात्मक प्रभाव
पर्यावरण को गंभीर नुकसान
मंडला में खनन व्यवस्था का नया नारा शायद यही है—
“परमिट बाद में, खुदाई पहले… और अगर पकड़े गए तो ‘सेटिंग’ समझिए पहले से ही तैयार!”
सवाल जो जवाब मांगते हैं!!
क्या प्रशासन को सच में कुछ पता नहीं?
अगर पता है तो कार्रवाई क्यों नहीं?
आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
जिले में जिस तेजी से अवैध खनन का खुला खेल खेला जा रहा हैं उस पर तत्काल रोक लगनी जरूरी है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं की यह कहावत चरितार्थ हो कि
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुभ गई खेत
दोषी क्रेशर मालिकों पर कड़ी कार्रवाई
संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी जरूरी है नहीं तो भोले भाले आदिवासी और
प्रभावित ग्रामीणों को न्याय और सुरक्षा कौन देगा
क्योंकि अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो मंडला की प्राकृतिक संपदा और भोली-भाली जनता दोनों ही इस “खुली लूट” का शिकार होते रहेंगे।
और तब शायद यह कहना गलत नहीं होगा—
“मंडला में कानून नहीं, सिर्फ कारोबार चलता है!”
