एक वैचारिक विश्लेषण
जितेन्द्र अलबेला
वर्तमान भारतीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब विरोध की भाषा अपनी मर्यादा खो देती है, तो वह लोकतंत्र के स्तर को गिराती है। हाल के दिनों में संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया गया, वह न केवल अत्यंत आपत्तिजनक हैं, बल्कि यह देश की 140 करोड़ जनता का भी अपमान है। जनता द्वारा चुने गए देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद की एक गरिमा होती है, और उस पर बैठे व्यक्ति पर अमर्यादित टिप्पणी सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार है।
बदलते राजनीतिक समीकरण और सिकुड़ती कांग्रेस
एक समय था जब पूरे देश पर कांग्रेस का एकछत्र राज था। लेकिन आज स्थिति यह है कि कांग्रेस के सांसदों की संख्या दहाई (दहाई के निचले स्तर) में सिमट कर रह गई है। जनता लगातार कांग्रेस की नीतियों और उनकी कार्यशैली को नकार रही है। इसके बावजूद, आत्मचिंतन करने के बजाय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बचकानी और घटिया भाषा का उपयोग किया जा रहा है। राहुल गांधी द्वारा ऐसा पहली बार नहीं किया गया है; अनेक अवसरों पर उनकी ऐसी भाषा देखी गई है, जिसकी सर्वत्र निंदा होनी चाहिए।
वैश्विक संकट और भारत की स्थिति
आज दुनिया जिन आर्थिक और वैश्विक संकटों से जूझ रही है, वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनाए हुए नहीं हैं। संपूर्ण विश्व इस दौर में संकट में है, लेकिन इसके बावजूद दुनिया के अन्य देशों की तुलना में आज भारत की स्थिति बहुत मजबूत और बेहतर है। प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक पटल पर भारत का नाम ऊंचा किया है। यही कारण है कि विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता शरद पवार समेत कई अन्य कांग्रेसी नेता भी समय-समय पर प्रधानमंत्री की कार्यपद्धति की प्रशंसा कर चुके हैं।
व्यक्तिगत आरोपों की राजनीति बनाम देशहित
वैश्विक संकट के इस दौर में राजनीति से ऊपर उठकर सभी को देश के प्रति सोचना चाहिए, न कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में समय गंवाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कांग्रेस के अन्य सांसद भी देशहित को सर्वोपरि मानने के बजाय राहुल गांधी की ‘हां में हां’ मिला रहे हैं, जो कि बेहद निंदनीय है। राहुल गांधी की इस अमर्यादित भाषा पर सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और नोटिस जारी करना चाहिए, क्योंकि यह देश के प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि देश के गौरव का अपमान है।
अतीत का सशक्त विपक्ष और वर्तमान की हकीकत
भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम दौर वह भी था जब वैचारिक मतभेदों के बाद भी देशहित सर्वोपरि होता था। एक समय था जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तत्कालीन विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेई को देश हित में विदेश भेजा करती थीं। उस समय का विपक्ष बेहद सशक्त और जिम्मेदार था। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने हमेशा देशहित में अपनी जान देने तक को तत्परता दिखाई।
राहुल गांधी को यह समझना होगा कि यदि उन्हें लोकतंत्र में बने रहना है, तो देशहित में एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभानी होगी।
महात्मा गांधी की वह चेतावनी…
मेरे सपने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने कहा,
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश की आ5सीजादी के बाद एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था कि:
देश अब आजाद हो चुका है, इसलिए दो स्पष्ट दल बनने चाहिए—एक सत्ता पक्ष और दूसरा विपक्ष।
कांग्रेस संगठन का निर्माण देश की आजादी के संघर्ष के लिए हुआ था, अतः अब इसे समाप्त कर देना चाहिए।
लेकिन कांग्रेस आज भी सिर्फ उस ‘नाम’ के सहारे चलने की कोशिश कर रही है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी की वह बात अब सही साबित होने जा रही है। अगर विपक्ष ने अपनी भाषा, मर्यादा और दिशा नहीं बदली, तो वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
(लेखक के निजी विचार)
